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बंजर जमीन को जंगली पेड़ों की मदद से बनी उपजाऊ, धान और गेहूं की हो रही खेती

1995-96 में उन्नाव के अधिकांश विकासखंडों से सम्बन्धित गांवों के किसान यहां की ऊसर जमीन को अनुपयोगी मानकर छोड़ चुके थे।
Author उन्नाव | August 2, 2017 05:25 am
तस्वीर का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया गय है। (File Photo)

रेहू के संक्रमण से प्रभावित जिले की 7640 हेक्टेअर भूमि पर वन विभाग की देखरेख में रोपित किए गए अनगिनत पौधों ने यहां की आबोहवा बदल कर रख दी है। लिहाजा खेती के लिए अब तक अनुपयोगी माने जा रहे भूभाग के बड़े हिस्से पर भी अब खेती की जा रही है। इससे उन्नाव के विकासखंड सिकंदरपुर सरोसी, सिकंदरपुर कर्ण, बीघापुर, सुमेरपुर, नवाबगंज, मियागंज, औरास, फजेहपुर चौरासी, बांगरमऊ व गंजमुरादाबाद क्षेत्र के किसान अब अपने को बदहाल नहीं मानते। पौधों की पत्तियों के साथ अन्य प्रयोगों के कारण यहां की ऊसर बंजर जमीन पर भी अब धान व गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है। बताते चलें कि वर्ष 1995-96 में उन्नाव के अधिकांश विकासखंडों से सम्बन्धित गांवों के किसान यहां की ऊसर जमीन को अनुपयोगी मानकर छोड़ चुके थे। लेकिन इसी बीच जिले में शुरू हुई ऊसर सुधार योजना के कारण किए गए प्रयोगों के अलावा बंजर बन चुकी धरती पर लगाए गए अनगिनत जंगली बबूल, यूकेलिप्टस के पेड़ों की मौजूदगी ने एक दशक के अंतराल में जो बदलाव किया है उससे हर कोई हतप्रभ है।

रेहू से प्रभावित उन्नाव की 7460 हेक्टेअर भूमि के अधिकांश हिस्सों पर अब फसलें पैदा की जा रही हैं। उल्लेखनीय है कि 2014-15 में जिले की वनक्षेत्र में चिन्हित 10889 हेक्टेअर भूमि में से मात्र 8 हजार हेक्टेअर भूमि को हरित क्षेत्र माना जा रहा था। लेकिन पौधरोपण ने स्थितियां बदल दी हैं। इसका नतीजा कृषि क्षेत्र में सकारात्मक है। इससे यहां की ऊसर भूमि का एचपीए मौजूदा समय में 11.5 से घटकर 9.40 तक पहुंच गया है। इससे जिले में धान की फसल की पैदावार तेजी से बढ़ रही है।डीएफओ वीके मिश्रा ने जनसत्ता से बात करते हुए कहा कि मौजूदा समय में जिले का वनाच्छादित क्षेत्र 9 हेक्टेअर से अधिक की भूमि मानी जा रही है। इसे अब तक अनुपयोगी माना जा रहा था।

विभाग की ओर से जनसामान्य के सहयोग से बेकार हो चुकी जमीन पर पौधरोपण कराया गया जिसमें रेहू से संक्रमित ऐसी जमीन जहां घास तक नहीं उगती थी, उस पर जंगली बबूल और यूकेलिप्टस के पौधों को रोपित किया गया। इसके प्रभाव से आसपास की जमीन अब ऊसर मुक्त हो चुकी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1978-79 में पद्मश्री केएन तिवारी की ओर से प्रोजेक्ट टाइगर के बाद सामाजिक वानिकी के माध्यम से जो अलख लोगों के बीच जलाई गई वह आज पल्लवित व पुष्पित होते दिखाई पड़ रही है।

जिले में हजारों में चल निकलीं पौध नर्सरी
पौधरोपण की प्रतिद्वंद्विता ने उन्नाव के बेरोजगारों को रोजगार देने का काम किया। पढ़े लिखे बेरोजगार युवकों ने कम जमीन व कम लागत से शुरू होने वाले नर्सरी व्यवसाय को अपनाया जिसके कारण अब गांव गांव किसानों को आम, जामुन, कटहल, पापुलर, यूकेलिप्टस व जंगली बबूल के पौधे आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। इससे यहां बरसात के दिनों में पौधरोपण काफी हो रहा है।

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