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सियासी समर में फिर झुलसने को तैयार भूखा-प्यासा उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के 51 जिले भयावह सूखे की चपेट में हैं। ग्रामीण इलाकों में न दाना नसीब हो रहा है और न ही पानी।
Author लखनऊ | April 20, 2016 23:51 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

भूख, बेरोजगारी, प्यास और बेबसी। सियासत करने के लिए जरूरी सभी पोषक तत्त्व इस वक्त उत्तर प्रदेश में मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश के मतदाता सियासत के इस दांव-पेच के अभ्यस्त हो चुके हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बुंदेलखंड का दौरा कर सरकारी इमदाद बांटने निकलते हैं तो भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्तअध्यक्ष उस बुंदेलखंड पर प्रदेश सरकार को घेरने की जुगत भिड़ाते नजर आ रहे हैं जहां की सभी सात लोकसभा सीटें उनकी झोली में हैं। इसमें केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री उमा भारती का नाम भी शामिल है।

उत्तर प्रदेश के 51 जिले भयावह सूखे की चपेट में हैं। ग्रामीण इलाकों में न दाना नसीब हो रहा है और न ही पानी। मवेशियों का हाल तो पूछिए ही मत। जिन जिलों में इंसानों को पीने का पानी मयस्सर नहीं वहां चौपायों की भला क्या बिसात? केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को देश के सूखाग्रस्त 10 राज्यों की जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें उत्तर प्रदेश के आधे से अधिक जिलों जिनकी संख्या 51 है, का उल्लेख है। जो जिले सूखाग्रस्त हैं, उनमें से अधिकांश में भाजपा के सांसद जीते हैं। बावजूद इसके जैसी मदद सूखा झेल रहे लोगों तक पहुंचनी चाहिए थी, वैसी केंद्र सरकार की तरफ से पहुंची नहीं है।

इस सच को राज्य सरकार का वह मेमोरैंडम उजागर करता है जिसमें कहा गया है कि प्रदेश ने सूखाग्रस्त जिलों के लिए केंद्र की नरेन्द्र मोदी की सरकार से दो हजार 57 करोड़ रुपए मांगे गए थे। इस मांग का सत्यापन कराने के लिए केंद्र सरकार ने जिस उच्च स्तरीय समिति का गठन किया, उसने महज एक हजार तीन सौ चार करोड़ 52 लाख रुपए मंजूर किए। इस धनराशि में से भी 934 करोड़ 32 लाख रुपए ही केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को दिए। उस उत्तर प्रदेश को जहां की 80 लोकसभा सीटों में से अपना दल के साथ 73 सांसद भारतीय जनता पार्टी के जीते हैं। जहां आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार बनाने के दिवास्वप्न देख रही है।

उत्तर प्रदेश में सियासत की चौखट तक पहुंचने की अहम कड़ी बन चुके सूखे पर राजनीतिक विश्लेषक बृजेश मिश्र कहते हैं, प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने नया नारा दिया है कि सूख प्रभावित जिलों में किसी को भूख से मरने नहीं देंगे। बीते चार बरस में सिर्फ बुंदेलखंड में गरीबी, बेबसी और कर्ज के चलते सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। मुख्यमंत्री थोड़ी सी इमदाद बांट कर बुंदेलखंड के लोगों के आंसू पोंछने की कोशिश करते हैं। लेकिन बुंदेलखंड सहित प्रदेश के सूखा प्रभावित जिलों में समस्या का मुकम्मल हल निकालने की इच्छा शक्ति अब तक न ही केंद्र सरकार ने दिखाई और न ही राज्य सरकार ने। सिर्फ मुआवजा बांट देने और खाद्य सामग्री वितरित कर देने मात्र से भूखों का पेट तो भरा जा सकता है लेकिन भूख से लड़ने का मुकम्मल रास्ता नहीं खोजा जा सकता है।

उत्तर प्रदेश के 51 सूखाग्रस्त जिलों में से 21 जिलों में किसानों की एक तिहाई से अधिक फसल तबाह हो चुकी है। ऐसे में इस बात का अंदाजा लगाना कठिन नहीं कि इन जिलों में किसानों के चूल्हे कितने दिनों में एक बार जल रहे होंगे। राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस हकीकत का अंदाजा केंद्र सरकार को होने के बाद भी प्रधानमंत्री ने इन जिलों से जीत कर आए भाजपा

सांसदों से जमीनी हकीकत संबंधी रिपोर्ट तलब नहीं की। यदि ऐसी कोई रिपोर्ट प्रधानमंत्री तक पहुंची होती तो इन 21 जिलों के लिए तो कम से कम कुछ खास एलान केंद्र सरकार की तरफ से किया ही गया होता? जाहिराना सच यह है कि इस बार उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में केंद्र और राज्य सरकारों को अपने काम का जवाब जनता को देना होगा। ऐसे में कौन कितनी हकीकत बता पाने का साहस बटोर पाएगा? उसका राजनीतिक भविष्य बहुत हद तक इस पर निर्भर होगा।

* उत्तर प्रदेश के 51 सूखाग्रस्त जिलों पर शुरू हुआ सियासी संग्राम।
* इनमें से 21 जिलों में किसानों की एक तिहाई से अधिक फसल तबाह हो चुकी है।
* उत्तर प्रदेश ने सूखाग्रस्त जिलों के लिए केंद्र से दो हजार 57 करोड़ रुपए मांगे गए थे।
* उच्च स्तरीय सत्यापन समिति ने एक हजार तीन सौ चार करोड़ 52 लाख रुपए मंजूर किए।
* इस धनराशि में से भी 934 करोड़ 32 लाख रुपए ही केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश को दिए।
* बुंदेलखंड सहित प्रदेश के सूखा प्रभावित जिलों में समस्या का मुकम्मल हल निकालने की इच्छा शक्ति केंद्र और राज्य सरकार ने नहीं दिखाई है।

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