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बुजुर्ग महिला निशानेबाजों के हौसले के आगे हार गई उम्र

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के छोटे से गांव जौहड़ी की रहने वाली 80 वर्षीय चंद्रो तोमर और 75 साल की प्रकाशो तोमर इस उम्र में भी सटीक निशाना लगाकर लोगों को दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर कर देती हैं।
Author बागपत | February 14, 2016 23:02 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उम्र के 65 से ज्यादा वसंत देखने के बाद निशानेबाजी के मैदान में हाथ आजमाने वाली दुनिया की सबसे उम्रदराज निशानेबाजों में शुमार दो महिलाएं इस खेल की बारीकियां नई पीढ़ी को सिखाना चाहती हैं। इसके लिए वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद चाहती हैं। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के छोटे से गांव जौहड़ी की रहने वाली 80 वर्षीय चंद्रो तोमर और 75 साल की प्रकाशो तोमर इस उम्र में भी सटीक निशाना लगाकर लोगों को दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर कर देती हैं। दुनिया की सबसे उम्रदराज निशानेबाजों में शुमार की जाने वाली इन महिलाओं के गांव में उनके कोच डॉक्टर राजपाल का एक शूटिंग रेंज भी है। उनकी इच्छा है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर अपने गांव में शूटिंग का माहौल और बेहतर करने की गुजारिश करें।

प्रकाशो का कहना है कि वह और उनकी जेठानी चंद्रो प्रधानमंत्री से मिल कर अपने शूटिंग रेंज को और बेहतर करने और वहां आकर निशानेबाजी के हुनर सीखने वाले गरीब बच्चों के लिए हथियार खरीदने के वास्ते आर्थिक मदद मांगेंगी। दो दर्जन से अधिक राष्ट्रीय तथा प्रान्तीय निशानेबाजी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर कई इनाम अपने नाम कर चुकी चंद्रो और प्रकाशो ने दिखा दिया कि उम्र किसी भी हुनर के आड़े नहीं आ सकती। तेज नजर की अनिवार्यता वाले इस खेल में 80 वर्षीय चंद्रो और 75 साल की प्रकाशो को पूरी तल्लीनता से हाथ आजमाते देखना खुद में कौतूहल वाली बात है।

65 साल की उम्र में निशानेबाजी की शुरुआत करनेवाली चंद्रो बताती हैं कि एक बार वह अपनी पोती के साथ गांव के मेले में गयी थी। पोती मेले में लगे निशानेबाजी शिविर में निशाना लगाने लगी तो उन्होंने पोती को ठीक से निशाना लगाना सिखाया। शिविर के ट्रेनर डॉक्टर राजपाल ने यह सब देखकर उन्हें निशानेबाजी की कला सीखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा ‘शुरू में तो मैंने ट्रेनर की सलाह अनसुनी कर दी लेकिन कुछ दिनों बाद उन्हें लगा कि क्यों ना मैं इस कला में अपने हाथ आजमा कर कुछ ऐसा कर जाऊं कि लोग मुझे हमेशा याद करें। तो मैंने भी अपनी प्रतिभा निखारने का फैसला किया और पोती के साथ मैं भी निशानेबाजी के गुर सीखने लगी।’

छह बच्चों और 15 पोते-पोतियों वाली चंद्रो ने बताया कि निशानेबाज के तौर पर उनका और उनकी देवरानी प्रकाशो का शुरूआती जीवन संघर्षों से भरा था। लोग उनका यह कहते हुए मजाक उडाते थे कि बुढ़िया इस उम्र में करगिल जाएंगी। यहां तक कि परिवार के लोगों ने भी शुरूआत में निशानेबाजी करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बिना झुके आगे बढ़ती गईं।

चंद्रो ने 2001 में वाराणसी में 24वीं उत्तर प्रदेश राज्य निशानेबाजी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया था। उसी साल दिल्ली में हुई एक प्रतियोगिता में एयर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था। इसके अलावा 2009 में सोनीपत में हुए चौधरी चतर सिंह मेमोरियल प्रतिमा सम्मान समारोह में उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सम्मानित किया था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के आग्रह पर वह पटना भी जा चुकी हैं जहां उन्होंने निशानेबाजों को बाकायदा गुर सिखाए थे।
उधर, प्रकाशो तोमर बताती हैं कि उन्होंने जेठानी चंद्रो के निशानेबाजी की शुरूआत करने के करीब 15 दिन बाद ही 60 साल की उम्र में शूटिंग के अभ्यास की शुरूआत कर दी थी। तब से अब तक वह विभिन्न स्तर के 25 से अधिक खिताब अपने नाम कर चुकी हैं।

प्रकाशो ने 2001 में चंडीगढ़ में 25 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक तथा 2001 में ही अहमदाबाद में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में स्वर्ण समेत कई पदक अपने नाम किए थे। उनकी बेटी सीमा और पोती रूबी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज हैं।प्रकाशो का कहना है कि निशानेबाजी का खेल बेहद महंगा है लेकिन वह चाहती हैं कि सिर्फ धन की कमी की वजह से ही ग्रामीण प्रतिभाएं दबकर ना रह जाएं। उनकी ख्वाहिश है कि प्रधानमंत्री उनकी भावनाओं का ख्याल करके उनके कोच के शूटिंग रेंज को अत्याधुनिक बनाकर और उनमें योग्य कोच का इंतजाम कराने के निर्देश दें।

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