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बेटे की मौत के 24 साल बाद मां को मिला इंसाफ, मद्रास HC ने देरी से न्याय करने के लिए मांगी माफी

इसके साथ ही जस्टिस शैशासई ने ऑथोरिटीज़ को चार हफ्तों में मृतक के परिवार को मुआवजा देने के लिए कहा है।
मद्रास उच्च न्यायालय (फोटो-विकिपीडिया)

एक मां अपने बेटे की मौत के बाद न्याय पाने के लिए मद्रास हाईकोर्ट के चक्कर लगा-लगाकर थक गई थी। इससे पहले की उस मां की हिम्मत जवाब देती हाईकोर्ट ने आखिरकार उसे 24 साल के बाद इंसाफ दे ही दिया। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने महिला से देरी से न्याय करने के लिए मांफी फी मांगी है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार 18 मई, 1993 में एक सड़क हादसे के दौरान बक्कियम का बेटा लोकेशवरन की मौत हो गई थी। लोकेशवरन एक लॉरी ड्राइवर था। यह हादसा इतना भयानक था कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई थी। काम के दौरान होने वाली मृत्यु पर बने एक्ट वर्कमैन कम्पेंसेशन के तहत बक्कियम ने मोटर एक्सिडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में इंश्योरेंस के पैसे के लिए क्लेम किया था।

वर्कमैन कम्पेंसेशन द्वारा महिला के क्लेम को खारिज कर दिया गया था जिसके बाद महिला ने फिर से एक नई याचिका डालकर 5 लाख रुपए के कंपेंसेशन के लिए मोटर एक्सिडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में आवेदन दिया। नेशनल इंश्यूरेंस कंपनी ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि अगर महिला पहले वर्कमैन कम्पेंसेशन के तहत याचिका दायर कर चुकी है तो वह दूसरी बार ट्रिब्यूनल में याचिका डालकर क्लेम नहीं कर सकती है। इस केस की सुनवाई करते हुए जस्टिस शैशासई ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की दलील को खारिज करते हुए कहा कि कंपनी को पीड़ित के परिवार को 3.4 लाख रुपए मुआवजा देना होगा।

इसके साथ ही जस्टिस शैशासई ने मृतक की मां से मांफी मांगते हुए कहा कि आपको आपको अधिकार दिलाने में काफी देरी हुई है हमसे इसके लिए आपसे मांफी मांगते है। इसके साथ ही जस्टिस शैशासई ने ऑथोरिटीज़ को चार हफ्तों में मृतक के परिवार को मुआवजा देने के लिए कहा है। जस्टिस शैशासई ने कहा कि पहली याचिका खारिज किया जाना बेबुनियाद था, जिसमें यह दावा किया गया था कि कंपनी को शक है कि मुआवजा की मांग करने वाला मृतक का परिवार नहीं है।

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