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जल्लीकट्टू और स्पेनिश बुल फाइटिंग में एक नहीं ये 5 अंतर हैं

कहावत है कि अंत भला तो सब भला। जल्लीकट्टू और स्पेनिश बुल फाइटिंग में सबसे बड़ा अंतर इसमें शामिल होने वाले बैलों की नियति से जुड़ा है।
जल्लीकट्टू पर रोक के विरोध में हजारों लोग चेन्नई के मरीना बीच पर डटे हुए हैं। (PTI Photo)

दक्षिण भारत में पोंगल के मौके पर आयोजित होने वाले जल्लीकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाे गए प्रतिबंध के खिलाफ हजारों लोग तमिलनाडु के विभिन्न इलाकों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पशु अधिकार संगठनों द्वारा दायर की गयी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस पारंपरिक खेल में बैलों के साथ क्रूरता की जाती है। जबकि प्रतिबंध का विरोध करने वाले इससे इनकार करते रहे हैं। बहुत से गैर-दक्षिण भारतीय लोगों को जल्लीकट्टू पर रोक के खिलाफ हजारों लोगों का सड़कों पर उतारना हैरान कर रहा है। बहुत सारे लोगों को लग रहा है कि जल्लीकट्टू स्पेन के बुल फाइटिंग जैसा ही खेल है जबकि वास्तविकता में दोनों में काफी अंतर है। आइए हम आपको बताते हैं जल्लीकट्टू और स्पेनिश बुल फाइटिंग के बीच पांच अंतर।

1- जल्लीकट्टू एक सांस्कृतिक आयोजन है जिसका जन्म कृषि प्रधान सभ्यता में हुआ है। जल्लीकट्टू पोंगल पर आयोजित होता है जो नई फसल का त्योहार माना जाता है। जल्लीकट्टू को प्रजनन के लिए सर्वश्रेष्ठ बैलों के चयन का माध्यम भी माना जाता है। कुछ लोगों के अनुसार जल्लीकट्टू करीब 2000 साल पुराना है। जल्लीकट्टू आयोजकों के लिए बैल पूजनीय होता है क्योंकि वो खेती का मुख्य आधार होता है। इसके उलट स्पेनिश बुल फाइटिंग सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए आयोजित की जाती है।

2- जल्लीकट्टू में प्रतिभागियों को बैलों के सींग पकड़ने की छूट नहीं होती। वो बैलों के सींग पर लगे नोट या दूसरे कीमती चीजों को लेने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन खेल में जीत हासिल करने के लिए प्रतिभागियों को बैल के पुट्ठे पकड़कर फिनिशिंग लाइन तक जाना होता है। प्रतिभागी बैल के पुट्ठे पकड़कर या उस पर लटकते हुए हुए फिनिंशिंग लाइन तक पहुंच जाते हैं तो उन्हें विजेता घोषित कर दिया जाता है। अगर वो ऐसा नहीं कर पाते तो बैल विजयी माना जाता है। इस तरह जल्लीकट्टू आदमी और बैल के बीच लड़ाई के बजाय बैल की सवारी करने का खेल है। स्पेनिश बुल फाइटिंग में प्रतिभागियों को सीधे-सीधे बैलों के सींग पकड़कर उनसे लड़ना होता है।

4- जल्लीकट्टू में प्रतिभागी किसी भी तरह बैल को चोट नहीं पहुंचाते हैं। वो किसी भी डंडे, रस्सी, हंटर या तलवार का प्रयोग नहीं कर सकते। जल्लीकट्टू में प्रतिभागी बैल को गुस्सा दिलाने या भड़काने की भी कोशिश नहीं करते। वहीं स्पेनिश बुल फाइटिंग में प्रतिभागी डंडे, रस्सी, हंटर और तलवार जैसी चीजों का प्रयोग करते हैं। स्पेनिश बुल फाइटिंग में प्रतिभागी बैलों के सींग पकड़ने, उन्हें चोट पहुंचाने और भड़काने के लिए आजाद होते हैं। स्पेनिश बुल फाइटिंग में बैलों को जितना भड़काया जाए प्रतिभागी को उतनी ही तारीफ मिलती है। स्पेनिश बुल फाइटर बैलों का खून बाहकर उन्हें कमजोर करते हैं ताकि उनपर काबू पाया जा सके।

5- कहावत है कि अंत भला तो सब भला। जल्लीकट्टू और स्पेनिश बुल फाइटिंग में सबसे बड़ा अंतर इसमें शामिल होने वाले बैलों की नियति से जुड़ा है। तमिलनाडु जल्लीकट्टू एक्ट 2009 में बैलों के संग दुर्व्यहार रोकने के लिए कड़े प्रावधान हैं। जल्लीकट्टू आयोजन के लिए भी नियम कायदे हैं। बैलों का निरोग होना जरूरी है। अपवाद को छोड़कर बैल घायल नहीं होते। जल्लीकट्टू में शामिल होने वाले बैलों को किसान पूजनीय मानते हैं और आयोजन के बाद भी उन्हें पूरा सम्मान देते हैं। वहीं स्पेनिश बुल फाइटिंग में शामिल बैल अक्सर मारे जाते हैं।

क्या है जल्लीकट्टू? क्यों हो रहा है इसे लेकर विवाद?

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  1. M
    Mukesh
    Jan 20, 2017 at 8:06 pm
    इस लेख को पढ़ने बाद मुझे लगता है की यह परंपरा प्रतिबंधित नहीं होनी चाहिए....
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    Reply
    सबरंग