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शाह को केशव से अधिक भरोसेमंद दिखे स्वामी

भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के मौर्य वोट बैंक पर निगाहें गड़ाए है।
Author लखनऊ | August 10, 2016 03:25 am
स्वामी प्रसाद मौर्य

भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के मौर्य वोट बैंक पर निगाहें गड़ाए है। सिर्फ तीन महीने पहले इस वोट बैंक को साधने के लिए केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद भी इत्मीनान न होने पर प्रदेश की मौर्य बहुल्य सौ सीटों को साधने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य पर अमित शाह ने दांव खेला है।

दरअसल अमित शाह जमुना के कछारी इलाके, पूर्वी उत्तर प्रदेश और विंध्य पर्वत माला के पूर्वी कोने पर बसे मौर्य वोट बैंक को किसी भी हाल में अपने हाथों से जाने नहीं देना चाहते। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में मतदाताओं की इस बिरादरी ने भाजपा पर भरोसा दिखाया था। इसी के बाद से स्वामी प्रसाद मौर्य का कद बहुजन समाज पार्टी में कम होना शुरू हुआ था।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मौर्य वोट बैंक को साधने के लिए अमित शाह ने तीन महीने पूर्व पिछड़ी जाति के केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्हें इस बात का भरोसा था कि केशव प्रसाद उत्तर प्रदेश की सौ विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका अदा करने वाले मौर्य वोट बैंक को काफी हद तक भाजपा के पाले में कर पाने में कामयाब हो जाएंगे। लेकिन राजनीति के जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी संभालने से पूर्व राजनीतिक तौर पर इलाहाबाद और कौशांबी तक ही सीमित रहे केशव प्रसाद मौर्य के लिए प्रदेश संगठन में अपनी पकड़ जमाना ही बड़ी चुनौती है। भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनने के पूर्व तक उनकी पकड़ अपनी मौर्य बिरादरी के मतदाताओं तक नहीं थी। इस बात का इल्म होते ही अमित शाह ने बहुजन समाज पार्टी में बीस बरस तक रहकर अपनी बिरादरी के मतदाताओं के बीच गहरी दखल रखने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य पर दांव खेला है।

उत्तर प्रदेश में मौर्य बिरादरी के मतदाताओं का प्रतिशत चार है और वे मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा बुंदेलखंड और सोनभद्र इलाके की सौ विधानसभा सीटों पर खासी दखल रखते हैं। ये वो इलाके हैं जहां केशव प्रसाद मौर्य का दखल न के बराबर है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक तीन माह पूर्व उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनने के बाद से लगातार केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश के दौरे पर हैं। उनका पूरा ध्यान संगठन के बीच अपनी पैठ गहरी करने पर टिका है। ऐसे में अपनी बिरादरी के मतदाताओं तक उनकी पहुंच कब तक गहरी हो पाएगी, यह बड़ा सवाल है।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राघवेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि अमित शाह ने केशव प्रसाद मौर्य पर दो माह तक बारीक नजर रखी। यह वह समय था जब स्वामी प्रसाद मौर्य बहुजन समाज पार्टी छोड़ नए विकल्प की तलाश में थे। इस समयावधि में भाजपा के राष्टÑीय अध्यक्ष को जब केशव प्रसाद मौर्य का दखल अपनी बिरादरी में खास नजर नहीं आया, तो उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य को भाजपा में शामिल करने पर अंतिम मुहर लगा दी। भाजपा के वरिष्ठ सूत्र बताते हैं कि शुरुआती दौर में दो बार स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने अमित शाह से बात की थी लेकिन उस वक्त उन्होंने इस पर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।

स्वामी प्रसाद मौर्य को भाजपा में शामिल करने पर पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि किसी भी दल का कोई भी नेता यदि भाजपा में आना चाहे और उसकी छवि अच्छी हो तो उसको शामिल करने का निर्णय पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ले सकता है। स्वामी प्रसाद मौर्य के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। इस मामले को अधिक तूल देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता दबी जुबान में कहते हैं कि स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा में शामिल होने के बाद केशव प्रसाद मौर्य को अपनी बिरादरी के मतदाताओं को लाने की दी गई जिम्मेदारी का क्या होगा?

फिलहाल स्वामी प्रसाद मौर्य की पैठ मौर्य बिरादरी में केशव प्रसाद मौर्य से अधिक है। इस बात को भाजपा के वरिष्ठ नेता भी दबी जुबान से स्वीकार करते हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि दो मौर्य नेताओं के भाजपा में होने के बाद वे अपनी बिरादरी का कितना वोट भाजपा में ला पाने में कामयाब हो पाते हैं?

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