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स्वामी हरिदास-तानसेन संगीत नृत्य महोत्सव

संगीत रसिकों, विशेषकर युवावर्ग को शास्त्रीय संगीत से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू किया गया विदुषी उमा शर्मा का महत्त्वाकांक्षी आयोजन स्वामी हरिदास तानसेन संगीत-नृत्य समारोह लोकप्रियता के सभी प्रतिमान तोड़ चुका है।
Author नई दिल्ली | January 17, 2016 23:52 pm
पं. हरिप्रसाद चौरसिया की एक प्रस्तुति। (फाइल फोटो)

संगीत रसिकों, विशेषकर युवावर्ग को शास्त्रीय संगीत से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू किया गया विदुषी उमा शर्मा का महत्त्वाकांक्षी आयोजन स्वामी हरिदास तानसेन संगीत-नृत्य समारोह लोकप्रियता के सभी प्रतिमान तोड़ चुका है। इस बात का गवाह मॉडर्न स्कूल का शंकरलाल सभागार था जहां आठ से ग्यारह जनवरी तक उमा शर्मा के भारतीय संगीत सदन ने श्रीराम सेंटर आॅफ परफॉर्मिंग आर्ट्स और एचसीएल कंसर्ट के साथ मिल कर मॉडर्न स्कूल, एसआरएफ, आर्ट कराट और लेमन ट्री के सौजन्य से स्वामी हरिदास-तानसेन संगीत नृत्य महोत्सव का भव्य आयोजन किया।

उमा शर्मा और उनकी शिष्याओं के नृत्य के बाद उद्घाटन संध्या के दूसरे फनकार थे उस्ताद शुजात खां जिनके सितारवादन में संगत के लिए तबले पर एक और थे अरुणांशु चौधरी और दूसरी और अमजद खान। राग यमन कल्याण जैसे मीठे राग से शुरुआत करते हुए आलाप, जोड़ झाले के दौरान आलाप में उन्होंने अपने गुरुपिता उस्ताद विलायत खां का सुरीला अंदाज भी दिखाया। जोड़ और झाले के दौरान अलग-अलग छंदों में उनका काम असरदार था। तीनताल के अद्धे ठेके में एक गत बजाने के बाद एक पारंपरिक बंदिश ‘दर्शन देहो शंकर महादेव..’ उन्होंने खुद गाते हुए बजाई। इसके बाद उर्दू के अशआर और ठुमरी की रूमानियत में उनका जवाब नहीं था। इस शाम के अंतिम कलाकार पं. अजय चक्रवर्ती ने राग आभोगी की सुमधुर अवतारणा की और अपने गायन का समापन पहाड़ी में प्रभावशाली ठुमरी गायन से किया।

समारोह की दूसरी शाम विदुषी अश्विनी भिड़े देशपांडे ने शाम के धीर गंभीर राग श्री में विलंबित बड़े खयाल के अलावा झपताल की ‘हरि के चरण कमल’ और तीन ताल की ‘एरी हंू तो आसान गैली पासन गैली ..’ जैसी मशहूर बंदिशें राग के समस्त वैभव और गहराई को उकेरते हुए पूरी प्रभविष्णुता से पेश कीं। अपने गायन का समापन उन्होंने ‘कैसे कटें दिन रतियां बालम बिन ..’ जैसे मीठे दादरे की रूमानी प्रस्तुति से किया। हारमोनियम पर विनय मिश्र और तबले पर विनोद लेले ने उनकी बेहतरीन संगति की। पं. हरिप्रसाद चौरसिया की बाँसुरी और उस्ताद आशीष खां के सरोद इस शाम के अन्य आकर्षण थे।

पं छन्नू लाल मिश्र ने तीसरी शाम उत्साही श्रोताओं को अपने प्रवचनी अंदाज और जिंदादिली भरे गायन से पूरे समय बांधे रखा। राग पूरिया धनाश्री से अपने गायन की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा- राग उतनी ही देर गाना चाहिए जितनी देर श्रोताओं का अनुराग बना रहे। अत: एकताल में बड़ा और तीनताल में छोटा ख्याल बाकायदा बढ़त, बोल आलाप, सरगम और आकार तान सहित गाकर उन्होंने जल्दी ही निपटा दिया और फिर सरगम की बंदिश, पारंपरिक ठुमरी तिलंग, बनारसी ठुमरी ‘कैसी बजाई श्याम बाँसुरिया..’, बंदिशी ठुमरी आदि की विविधता दिखाने के बाद उन्होंने दादरा ‘छांडो लंगर मोरी बहियाँ गहो ना’। पर भाव बताने के लिए उमा जी को गुहार लगाई। उमाजी के आने के बाद तो महफिल और भी रंग में आ गई। अपनी जोरदार पेशकश का समापन इन्होंने भगवान शिव की होरी से किया। तबले पर उनका धुआंधार साथ दिया उनके ही सुपुत्र राम कुमार मिश्र ने और हारमोनियम पर विनय मिश्र ने।

पं रविशंकर की बेटी और शिष्या अनुष्का शंकर ने भी अपनी मुख्य प्रस्तुति के लिए राग पूरिया धनाश्री ही चुना जो उनके ठीक पहले पं छन्नूलाल मिश्र गा चुके थे और उन्हीं के सिद्धांत यानी ‘राग में श्रोताओं के अनुराग’ की अवधि तक कुल पंद्रह-बीस मिनट में आलाप जोड़ झाले सहित सात मात्रा के रूपक ताल में गत बजा कर अनुष्का ने मुख्य राग को विराम दे दिया। मीठे के लिए राग मांझ खमाज में उन्होंने पं. रविशंकर की रची गत बजाते हुए पहाड़ी, केदार आदि की रागमाला सी पिरोते हुए मांझ-खमाज की द्रुत गत में झाले से अपनी प्रस्तुति संपन्न की। तबले पर बिक्रम घोष ने अच्छा साथ दिया। अनुष्का की सबसे बड़ी सफलता थी अपने सितार से पं रविशंकर की याद दिला पाना।

स्वामी हरिदास – तानसेन संगीत नृत्य समारोह का सुरीला समापन उस्ताद अमजद अली खान और उनके यशस्वी सुपुत्रों अमां अली खां औ अयान अली खां के सरोद वादन से हुआ।

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