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राज्यपालों की बर्खास्तगी पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से जवाब तलब

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद राज्यपाल के पद से हटाये गये कुरैशी ने आरोप लगाया है कि तत्कालीन गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने उन्हें इस्तीफा देने अथवा बर्खास्तगी का सामना करने की धमकी दी थी।
Author नई दिल्ली | January 28, 2016 01:59 am
उच्चतम न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने पर यूपीए सरकार के कार्यकाल में नियुक्त उत्तराखंड और पुडुचेरी के राज्यपालों को बर्खास्त करने के मामलों में केंद्र सरकार से बुधवार को जवाब तलब करते हुए कहा कि यह गंभीर मसला है। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने तत्कालीन राज्यपाल अजीज कुरैशी और वीरेंद्र कटारिया की याचिकाओं पर केंद्र से चार हफ्ते के भीतर जवाब तलब किया। इस मामले में अब 28 मार्च को आगे सुनवाई होगी।

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद राज्यपाल के पद से हटाए गए कुरैशी ने आरोप लगाया है कि तत्कालीन गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने उन्हें इस्तीफा देने या बर्खास्तगी का सामना करने की धमकी दी थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यह गंभीर मामला है और हम एक ऐसी रूपरेखा तैयार कर सकते हैं जिसमें इस तरह के उच्च संवैधानिक व्यक्तियों से संवाद स्थापित किया जाए। केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और दो बर्खास्त राज्यपालों का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ वकील विवेक तंखा कर रहे थे। सुनवाई के दौरान पीठ ने इस तथ्य को नोट किया कि गृह सचिव ने कुरैशी को फोन किया था जबकि कटारिया के मामले में गृह सचिव के निजी सचिव ने राज्यपाल को फोन किया था। अदालत ने गोस्वामी को भी नोटिस जारी किया है।

शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 156 (राज्यपाल के कार्यकाल की अवधि) की व्याख्या के लिए 21 अगस्त, 2014 को कुरैशी का मामला पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिया था। कटारिया की याचिका भी इसी के साथ सूचीबद्ध की गई थी क्योंकि इसमें भी समान मुद्दा उठाया गया था। मोदी सरकार से बर्खास्त किए जाने के खिलाफ शीर्ष अदालत पहुंचने वाले कुरैशी पहले राज्यपाल थे। इनसे पहले सरकार ने दो अन्य राज्यपालों को भी बर्खास्त किया था। केंद्र में राजग के सत्ता में आने के बाद यूपीए के शासन में नियुक्त चार अन्य राज्यपालों ने इस्तीफा दे दिया था।

कुरैशी ने याचिका में दावा किया था कि संविधान के अनुच्छेद 156 का पालन नहीं किया गया। गृह सचिव का राज्यपाल को धमकी देना असंवैधानिक है। कुरैशी ने कहा था कि केंद्र और गृह सचिव से पूछा जाना चाहिए कि किसके इशारे पर उन्हें धमकी दी गई। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया कि ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ सख्त टिप्पणी की जाए। कुरैशी को पांच साल के लिए राज्यपाल नियुक्त किया गया था और उन्होंने 15 मई, 2012 को पदभार ग्रहण किया था।

उन्होंने याचिका में दावा किया था कि राजग के केंद्र में सत्ता में आने के बाद गोस्वामी ने 30 जुलाई, 2014 को उन्हें फोन किया और कहा कि वे इस्तीफा दे दें। उन्होंने यह भी कहा था कि वह नहीं हटे तो उन्हें हटा दिया जाएगा। याचिका के अनुसार कुरैशी ने 2 अगस्त, 2014 को राष्ट्रपति और गृह मंत्री को गोपनीय संवाद के जरिए अपनी सफाई दी थी। इस संवाद की प्रतियां सीलबंद लिफाफे में अदालत को भी अवलोकनार्थ दी गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि गोस्वामी ने 8 अगस्त, 2014 को उन्हें दोबारा फोन कर इस्तीफा देने के लिए दबाव डाला।

कुरैशी से पहले राजग सरकार ने मिजोरम की राज्यपाल कमला बेनीवाल को बर्खास्त किया था। गोस्वामी ने यूपीए के कार्यकाल में नियुक्त कुछ राज्यपालों को फोन कर उन्हें पद से इस्तीफा देने के लिए कहा था। इसके बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन, नगालैंड के राज्यपाल अश्विनी कुमार, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी और छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।

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