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नृत्य रचना में पुरुष प्रधान व्यवस्था पर चोट

करीब चालीस साल पहले डा किरण सेठ ने स्पीक मैके की नींव रखी थी। कुछ कलाकारों और बुद्धिजीवियों के सहयोग से यह सांस्कृतिक मिशन शुरू हुआ था।
वरिष्ठ नृत्यांगना सोनल मानसिंह (फाइल फोटो)

स्पीक मैके के वार्षिक आयोजन विरासत-2016 समारोह का आरंभ वरिष्ठ नृत्यांगना सोनल मानसिंह के नृत्य से हुआ। समारोह सोलह फरवरी से आइआइटी दिल्ली के सभागार में आयोजित था। सोनल ने अपनी ओडिशी नृत्य का आरंभ देवी स्तुति और देवी मंगलाचरण से किया। ‘या कुंदेतुषार हार धवला’ और गीत ‘भवानी दयानी महावाकवाणी’ पर आधारित इस नृत्य में देवी के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया। नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने हस्तमुद्राओं, भंगिमाओं और मुद्राओं से देवी के महिषासुरमर्दिनी, चंडी, कमला, बगलामुखी, भैरवी, भुवनेश्वरी, धूमावती, छिन्नमस्ता, तारा, काली, मातंगी, षोडशी व त्रिपुरसुंदरी रूपों को चित्रित किया। उनकी आंखों में भाव की तेज सहज ही रूपायित हुई।

करीब चालीस साल पहले डा किरण सेठ ने स्पीक मैके की नींव रखी थी। कुछ कलाकारों और बुद्धिजीवियों के सहयोग से यह सांस्कृतिक मिशन शुरू हुआ था। सफर की उस शुरुआत में डा सोनल मानसिंह उनके साथ थी। वरिष्ठ नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने उन दिनों को याद करते हुए कहा कि ओड्र देश या कलिंग यानि आज के ओड़ीशा में ओडिशी नृत्य का जन्म हुआ था। उस भूमि में जहां सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ था। यह बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त और वैष्णव सभी धर्मों की मिलन स्थली रही है। खंडारगिरि की रानी गुंफा और मंदिरों के भग्नावशेषों में मूर्तियों की आकृतियों में ओडिशी नृत्य की भंगिमाएं मिलती हैं। इस परंपरा को महारी नृत्यांगनाओं और गुरुओं ने अपनी साधना से समृद्ध और संपन्न बनाया।

सोनल मानसिंह ने करीब 18-20 साल पहले नृत्य रचना ‘आज की कन्या’ पेश की थी। इसमें नारी के दुख, पीड़ा और अपने अधिकारों के प्रति जागृत होती महिलाओं का चित्रण उन्होंने पेश किया। यह रचना ‘मैं हूं आज की कन्या’ पर आधारित थी। रचना के अंश ‘दुखों की कैद में कितनी झुलस रही हूं, तुम्हारे न्याय मीमांसा सदा देती रही झांसा’ में पुरुष प्रधान व्यवस्था पर जोरदार प्रहार करते हुए, नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने भावों को प्रभावकारी तरीके से व्यक्त करते हुए नृत्य किया। उन्होंने इस प्रस्तुति से अपने सामाजिक दायित्व का सरलता से निर्वाह किया। उन्होंने नृत्य से औरतों को जागृति का संदेश दिया। उन्होंने समसामयिक विषय को उठाकर कलाकार के सामाजिक दायित्व को निभाया, जो एक बड़ी बात है। वास्तव में, उन्होंने लीक से हटकर हिंदी रचना को ओडशी की भावों और अभिनय में पिरोकर नवाचार प्रस्तुत किया, जिसे वह दशकों से करती रहीं हैं और यही कलाकार की सृजनशीलता का परिणाम है।

देवी पार्वती के जीवन से जुड़े प्रसंगों के जरिए देवी नवरस पेश किया गया। नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने इस प्रस्तुति की शुरुआत शृंगार रस से की। उन्होंने शृंगार-‘शृंगारं शिव विवाहे’, वीर- ‘वीरं दैत्य विनाशे’, करूण-‘भक्त जने संकटे’, हास्य-‘शिव गण खेलने’, अद्भुत-‘बाल विनायक सृजने’, रौद्र-‘दक्ष यज्ञ विनाशने’, भय-‘रावणात कैलाशगिरि उत्थान प्रयत्ने’, विभत्स-‘कामदेव दहने निरर्थक’ व शांत-‘देवी भगवते अरोधने’ को दर्शाया। उनकी यह प्रस्तुति भावपूर्ण और काफी परिपक्व थी। उनके साथ में नर्तक आशीष मलिक ने विभिन्न भूमिकाओं में मोहक नृत्य पेश किया। उन्होंने ओडिशी के साथ छऊ नृत्य को प्रस्तुत किया।

नृत्य प्रस्तुति में संगत कलाकारों में शामिल थे-मरदल पर प्रदीप कुमार महाराणा और सरोद पर अबरार हुसैन। सालों से गायन में नृत्यांगना सोनल मानसिंह के साथ गायक बंकिम सेठी सहयोग करते रहे हैं। नृत्यांगना के भावों को समझते हुए बंकिम सेठी ने सरस अंदाज में रचनाओं को सुरों में ढाला।

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