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यूपी में कांग्रेस का चेहरा बन सकती हैं शीला दीक्षित

शीला दीक्षित पहली बार 1984 में सांसद बनकर राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री कार्यालय की मंत्री बनी थीं।
Author नई दिल्ली | May 3, 2016 05:27 am
शीला दीक्षित 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं।

लगातार 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित की नई पारी की अटकलें तेज हो गई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा बनाने के कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के रणनीतिकार बने प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार सामने करके चुनाव लड़ने की सलाह दी है।

दिल्ली में कांग्रेस को शिखर पर पहुंचाने वालीं 78 साल की शीला दीक्षित 2013 के विधानसभा चुनाव में हार गई थीं और उनकी पार्टी हाशिए पर पहुंच गई थी। भला हो कांग्रेस आला कमान का जिसने उन्हें केरल का राज्यपाल बना दिया। इसलिए यह तो माना जा रहा है कि पार्टी में फेरबदल होने पर उन्हें महासचिव जैसा महत्त्वपूर्ण पद मिल सकता है, लेकिन दिल्ली के नेता तो उनका परछाई से भी दूर भागने लगे हैं। दिल्ली के कांग्रेस नेताओं में शीला दीक्षित से ज्यादा उनके बेटे और पूर्व सांसद संदीप दीक्षित का विरोध है।

शीला दीक्षित पहली बार 1984 में सांसद बनकर राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री कार्यालय की मंत्री बनी थीं। बाद में वे मुख्यधारा से अलग हो गर्इं, लेकिन 1998 में कांग्रेस ने उन्हें पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और चुनाव हारने के बाद उन्हें प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंप दी गई। 1998 के विधानसभा चुनाव से शीला दीक्षित ने जीत का जो सिलसिला शुरू किया वह 2008 तक जारी रहा। पहले जो नेता उन्हें बाहरी बताकर नजरअंदाज करते थे वही उनके सामने दंडवत होने लगे। 2013 में आम आदमी पार्टी (आप) की आंधी ने कांग्रेस के किले को ढहाया तो 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के तूफान ने कांग्रेस का सफाया कर दिया।

दिल्ली की राजनीति में फिर से जगह बनाने में दीक्षित परिवार को काफी समय लगेगा। उन्हें तभी महत्व मिलेगा जब उनके विरोधी फेल हो जाएं या पार्टी नेतृत्व उनको जबरन दिल्ली की कमान सौंप दे। उत्तर प्रदेश के हालात इससे अलग हैं। वहां कांग्रेस पहले से ही बुरे हाल में है। दलितों की ज्यादातर बिरादरी मायावती के साथ है, लेकिन वाल्मीकि समाज की सहानुभूति कांग्रेस के साथ ज्यादा रही है। चाहे उत्तर प्रदेश हो या दिल्ली, उन्हें कांग्रेस में लौटाने की पहल सफल हो सकती है।

शीला दीक्षित राजनीति में बड़ा नाम हैं और उत्तर प्रदेश में ही उनकी राजनीतिक जमीन है। फिलहाल सबसे बड़ी रुकावट उनकी उम्र और स्वास्थ्य है। संभव है कि ज्यादा जिम्मेदारी मिलने पर उनके काम का तरीका बदले और वे ज्यादा काम कर पाएं। खुद दीक्षित इस बारे में कुछ भी बोलने से बच रही हैं उनका कहना है कि उनसे इस बारे में किसी ने बात नहीं की है। वे तो बस पार्टी के काम में ही लगी हुई हैं।

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