April 30, 2017

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साहित्य जीवन का एक पहलू है, उसका काम दुनिया को बदलना नहीं है…

प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री है, जाति है, दिखते सब हैं। लेकिन प्रेमचंद की स्त्री और जाति-व्यवस्था के शोषण में पिस रहे किरदार चैतन्य रूप से कोई आंदोलन खड़ा करते नहीं दिखते हैं।

इस साल जनवरी में दिल्ली आए बुकर पुरस्कार विजेता आॅस्ट्रेलियाई लेखक रिचर्ड फ्लैनेगन ने अमेरिका में बनी ट्रंप की सरकार को साहित्य की नाकामी मानने से साफ इनकार किया। उन्होंने कहा कि साहित्य जीवन का एक पहलू है और उसका काम दुनिया को बदलना नहीं है। उन्होंने ट्रंप की जीत को बुनियादी असंतोष का परिणाम बताया न कि अच्छी किस्सागोई का। शीर्ष कलमकार कह रहे हैं कि साहित्य का काम दुनिया बदलना नहीं है। 2014 में मोदी और उसके बाद अमेरिका में ट्रंप सरकार बनने के बाद बगलें झांकते उदारवादी विद्वान ‘उत्तर सत्य’ की च्युइंगम चबाने में मशगूल हो गए और दावा किया गया कि ट्रंप की जीत के बाद जॉर्ज आॅरवेल की ‘1984’ की बिक्री एकाएक बढ़ गई है। ट्रंप की जीत के बाद आॅरवेल की किताब पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन शुरू हुआ।

आॅरवेल 1949 में ही ‘1984’ का खाका खींच कर बताते हैं कि पूर्ण रूप से अधिनायकवादी सरकार आने का हश्र क्या होगा? आॅरवेल अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता के लिए जाने जाते हैं। साहित्य की दुनिया में ‘1984’ पर बहुत विमर्श हुआ, फिल्में बनीं। अगर साहित्य के पन्नों पर ‘1984’ मौजूद था ही तो मोदी-ट्रंप-योगी सरकार पर साहित्य को चौंकना क्यों पड़ा?

आज जब हम हिंदी क्षेत्र के संदर्भ में पत्रकारिता की बात करते हैं या साहित्यिक पत्रकारिता की बात करते हैं तो भारतेंदु और द्विवेदी युग का जिक्र करते हैं। चाहे बंगाल हो या महाराष्ट्र, आप दोनों जगह देख सकते हैं कि कोई भी सामाजिक सुधार सामाजिक आंदोलन के जरिए ही आया। इसके उलट हिंदी पट्टी में कोई भी सामाजिक सुधार एजंडे पर आया ही नहीं, न ही कोई आंदोलन छेड़ा गया। यहां हम साहित्य में उपनिवेशवाद का तीखा विरोध देखते हैं। लेकिन सामाजिक, जातिगत, स्त्री का मुद्दा एजंडे से बाहर ही रखा गया है। हिंदी पट्टी का पूरा साहित्य उपनिवेशवाद विरोधी मानसिकता से तो लैस है लेकिन इसके केंद्र में सामाजिक सुधार नहीं रहा है।

और, अगर हम साहित्यिक पत्रकारिता के पुरोधा, पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र और भारतेंदु युग की बात करते हैं तो उनके रचे में भी राजनीतिक सुधार है, सामाजिक सुधार नहीं। भारतेंदु लिखते हैं, ‘रोवहु सब मिलि के आबहु भारत भाई/हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई’। वे उपनिवेशवाद विरोधी सुर की लामबंदी की बात करते हैं। इस लामबंदी की तस्वीर औपनिवेशिक ढांचे को लेकर हो रही है। लेकिन जब भारतेंदु स्त्रियों को लेकर ‘बालाबोधिनी’ निकालते हैं तो आप उसकी पहचान देखिए? क्या भारतेंदु अपनी लेखनी के जरिए लड़कियों को लोकतांत्रिक या आधुनिक चेहरा देने की बात करते हैं? तो इसका जवाब है नहीं। ‘बालाबोधिनी’ का बोध एक बाला को आदर्श नारी बनने की ओर उन्मुख करता है। बदलते भारत की जरूरतों के हिसाब से स्त्री को तैयार करना।

भारत में औपनिवेशिक शासन काल में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत हो चुकी थी, अंग्रेजी दवाएं आ चुकी थीं। दफ्तरों की चिट्ठी घरों में आने लगी थी। इसलिए इस बदलते भारत के संदर्भ में स्त्रियों को तैयार करना था। अगर किसी सामंत या भारतीय हिंदू अधिकारी के घर में अंग्रेज अफसर आते हैं और अपने साथ अपनी संगिनी को लाते हैं तो अंग्रेज संगिनी का साथ कौन देगी? अगर पति घर में नहीं हैं और दफ्तर से कोई आवश्यक चिट्ठी आई है तो उसे कौन पढ़ेगा? घर में बच्चा बीमार है तो अंग्रेजी दवा की बोतल पर नाम कौन पढ़ेगा? मां अंग्रेजी पढ़ना जानेगी तो बच्चे को सही दवा देगी। ‘बालाबोधिनी’ का मकसद स्त्री को पितृसत्ता के खिलाफ खड़ा करना नहीं था, बल्कि पित्तृसत्ता के झंडाबरदारों की कुशल सहायिका का निर्माण करना था। बदलते हिंदुस्तान के हिसाब से संगिनी तैयार करना था।

प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री है, जाति है, दिखते सब हैं। लेकिन प्रेमचंद की स्त्री और जाति-व्यवस्था के शोषण में पिस रहे किरदार चैतन्य रूप से कोई आंदोलन खड़ा करते नहीं दिखते हैं। एक भावनात्मक हिलोरें मारते हुए, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तक ही सीमित रहते हैं। यहां भी औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ ही चेतना दिखती है, समाज सुधार लक्ष्य नहीं होता है। इक्कीसवीं सदी में पूरी हिंदी पट्टी में एक भी सामाजिक सुधार आंदोलन नहीं दिखता है। जो साहित्य में हो रहा है वह जमीन पर नहीं हो रहा है। साहित्यिक पत्रकारिता के तौर पर प्रगतिशील आंदोलन को उल्लेखित किया जा सकता है, लेकिन हिंदी पट्टी के जल-जंगल और जमीन पर आप इस प्रगतिशीलता को नहीं खोज पाएंगे।
हिंदी पट्टी में बजरिए पत्रकारिता साहित्य की ओर से जो भी विमर्श छिड़ा है क्षेत्र को लेकर, लिपि को लेकर, भाषा को लेकर, औपनिवेशिक ढांचे को लेकर है। कहीं कुछ प्रवचनात्मक अंदाज में सामाजिक सुधार की बात आती है लेकिन वह विमर्श का रूप नहीं ले पाती है। साहित्य में प्रचंड राजनीतिक विमर्श है और जमीन पर कोई सामाजिक आंदोलन नहीं। और इसके नतीजे में जब ट्रंप जीतते हैं और मोदी अपनी मशाल योगी को थमाते हैं तो सबसे ज्यादा चौंकता साहित्य ही है। और साहित्य का यह चौंकना बताता है कि वह समाज से कितना दूर है।

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First Published on April 21, 2017 2:59 am

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