December 08, 2016

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तो तीनों निगमों के विभाजन की रणनीति पर उठे सवाल

पूर्वी दिल्ली नगर निगम के सिविक सेंटर में जाने का प्रस्ताव पास होने के बाद निगम विभाजन पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं।

Author नई दिल्ली | November 4, 2016 01:13 am

पूर्वी दिल्ली नगर निगम के सिविक सेंटर में जाने का प्रस्ताव पास होने के बाद निगम विभाजन पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए हैं। जिन उद्देश्यों को लेकर निगम का विभाजन किया गया था उनमें अब तक कोई भी पूरा नहीं हुआ और आखिरी तर्क कि लोगों को अपने काम में ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा वह भी तीनों निगम का मुख्यालय एक ही जगह होने के बाद उसका कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। जिस तरह बंटवारे से पहले निगम मुख्यालय टाउन हॉल था उसी तरह अब सिविक सेंटर मुख्यालय बन जाएगा। फिर इस विभाजन के क्या मायने रहे। इस पर निगम नेता अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। बंटवारे के मूल बिंदु से अलग अब बंटवारे के बाद तो खर्चे बढ़े ही हैं। दिल्ली सरकार के समानांतर काम कर रहीं नगर निगम सालों तक तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को अखरती रहीं। पहले दीक्षित ने निगम को दिल्ली सरकार के अधीन करने की योजना पर काम किया। जब केंद्र सरकार राजी नहीं हुई तो निगम की सीटें 138 से 272 बढ़ाकर निगम पार्षदों की हैसियत कम कर निगम पुनर्गठन के लिए कई समितियां बना दीं। इससे दीक्षित को निगम पर नियंत्रण तो नहीं मिला पर 2012 में तीन भागों में बंटवारे कर इसके मूल उद्देश्यों का बंटाधार कर दिया गया।

 

पहले सिविक सेंटर के कब्जे पर विवाद हुआ। बाद में दक्षिणी और उत्तरी को वहीं शिफ्ट कर पूर्वी निगम को किनारे किया गया ताकि मामला कुछ ठंडा पड़ जाए। बताते हैं कि पूर्वी निगम मुख्यालय के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर के पास डीडीए से जमीन ली गई है। लेकिन अभी तक कर्ज जारी नहीं होने से वह बनना शुरू नहीं हो पाया और अब निगम स्थाई समिति में आयुक्त के प्रस्ताव को कि पूर्वी निगम को सिविक सेंटर ले जाने में भलाई है को पक्ष और विपक्ष ने पास कर नया विवाद खड़ा कर दिया है।
पूर्वी दिल्ली निगम की स्थाई समिति के अध्यक्ष जितेंद्र चौधरी ने कहा कि तीन करोड़ रुपए हर साल रखरखाव के लिए डीएसआइडीसी को देने पड़ते हैं। अभी निगम की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है। पूर्वी निगम का मुख्यालय बनने में भी कम से कम पांच साल लग जाएंगे। लिहाजा निगम ने फैसला किया है कि जब तक नया मुख्यालय नहीं बन जाता तब तक इसे भी सिविक सेंटर में स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि रखरखाव का पैसा बचाकर निगम के विकास में लगाया जाए।

 

पूर्वी निगम के उपाध्यक्ष राजकुमार ढिल्लो ने कहा कि पूर्वी निगम शुरू से आर्थिक तंगी में रहा है। बंटवारे से पहले जब सिविक सेंटर बना था तब यह तय नहीं हो पाया था कि यहां किस निगम का मुख्यालय बनेगा। दक्षिणी और उत्तरी ने वहां अपना मुख्यालय बनाकर घाटे को पाटने का काम किया जबकि पूर्वी निगम को अपनी माली हालत पड़ छोड़ दिया गया। लिहाजा निगम ने प्रस्ताव पास किया है कि जब तक हमारा नया मुख्यालय नहीं बनेगा तब तक सिविक सेंटर के एक भाग में पूर्वी निगम मुख्यालय को भी जगह दे दी जाए। दिल्ली की सबसे बड़ी और अत्याधुनिक तकनीक से लैश सिविक सेंटर की इमारत के बनते ही 2012 में निगम का बंटवारा हो गया। बंटवारे के बाद तीनों निगमों में भाजपा सत्तासीन हुई। उत्तरी निगम के अधीन सिविक सेंटर आया तो दक्षिणी निगम को मुख्यालय बनाने तक यहां किराए पर 40 फीसद हिस्सा दे दिया गया। मौजूदा समय में दक्षिणी निगम पर उत्तरी निगम के बकाया करीब आठ सौ करोड़ पर दबी जुबान नहीं बल्कि खुलेआम विरोध जताया जा रहा है।

दक्षिणी निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जिस समय सिविक सेंटर बना था उस समय दिल्ली में एक ही नगर निगम था। ऐतिहासिक टाउन हॉल को विरासती इमारत बनाकर निगम की भीड़-भाड़ को अलग ले जाने के तर्क पर बने सिविक सेंटर को बनाने में तीनों निगमों का खर्चा हुआ था। साल 2012 में भाजपा को शिकस्त देने की चाह से दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की जिद के कारण निगम का बंटवारा हो गया। हालांकि बंटवारे का विरोध कांग्रेसियों ने ही सबसे पहले किया था। सोनिया गांधी से लेकर कांग्रेस के तमाम आला नेताओं तक यह मामला गया। लेकिन होना वही था जो शीला दीक्षित ने चाहा। बंटवारे के समय यह मुद्दा कहीं नहीं था कि सिविक सेंटर का सुंदर मुख्यालय उत्तरी निगम को ही जाएगा। जब निगम तीन भागों में बंट गया और इसके क्षेत्रफल से लेकर इलाके का बंटवारा शुरू हुआ तो सिविक सेंटर उत्तरी निगम में आ गया।

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First Published on November 4, 2016 1:12 am

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