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पंजाब: दो साल बाद छेड़ी जीत की तान, तीन पदों पर फहरा परचम

इस साल लड़कियों की बचीखुची सरगर्मी इस साल के छात्र संघ चुनाव में हवा होती नजर आई क्योंकि उनके परिजनों ने अपने नाम का नया बखेड़ा मोल नहीं लेने में ज्यादा भलाई समझी, जिस कारण छात्राएं बेहद सीमित संख्या में वोट डालने घरों से निकलीं।
Author चंडीगढ़  | September 14, 2017 02:23 am
एबीवीपी के खिलाफ प्रदर्शन करते जेएनयू, डीयू और जामिया के छात्र। (Photo Source: PTI)

अजय शर्मा

दस साल के लंबे इंतजार के बाद पंजाब की बादल नीत अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार को बेदखल कर सत्ता में लौटी कांग्रेस की ‘कैप्टन दी सरकार’ का फायदा एक मायने में पंजाब विश्वविद्यालय-चंडीगढ़ के छात्रसंघ चुनाव में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन आॅफ इंडिया (एनएसयूआइ) को भी हुआ लगता है। और तो और, छात्रसंघ चुनाव में दो साल बाद जीत की तान छेड़ते हुए कांग्रेस समर्थित एनएसयूआइ को तीनों आला पदों-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और महासचिव पद पर कब्जा जमाया, जबकि पुसू गठबंधन सिर्फ संयुक्त सचिव पद तक सिमटने को मजबूर हुआ। एनएसयूआइ की इस शानदार और काबिलेगौर जीत में कई पहलू जिम्मेदार रहे। पहला यह कि अब से पहले जब पंजाब में शिअद-भाजपा गठबंधन सरकार सूबे में काबिज थी, तो विशेषकर अंतिम दो वर्षों (2015 और 2016) के दौरान खुद शिअद प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने पंजाब विश्वविद्यालय परिसर में पूरी दिलचस्पी दिखाते हुए कैंपस के दौरे कर वहां कई तरह के वादे किए, जिसका फायदा अकाली समर्थित सोई छात्र संगठन को 2015 के चुनाव में क्लीन स्वीप के रूप में मिला। उसके बाद 2016 में भी सुखबीर सिंह का ही जादू था कि तमाम छात्र संगठनों के सहयोग से सोई ने एक बार फिर कामयाबी की इबारत लिख दी। पर इस साल क्योंकि शिअद को सूबे की सत्ता से बाहर होना पड़ा, ऐसे में शायद सोई की किस्मत भी सोई थी कि पंजाब विश्वविद्यालय परिसर से उसे भी सत्ताच्युुत होना पड़ गया।

एनएसयूआइ की जीत में मददगार दूसरा अहम पहलू अप्रैल महीने में फीस वृद्धि के मसले पर भड़की छात्र हिंसा साबित हुई, जिसमें नौबत वामपंथी समर्थित छात्र संगठन एसएफएस की अगुवाई में शुरू हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पहले तो परिसर में विद्यार्थियों के सिरफुटौव्वल और फिर यूटी पुलिस द्वारा परिसर में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं की धरपकड़ तक पहुंची। इन पकड़ी गर्इं तमाम लड़कियों के अभिभावकों और परिजनों को दिनरात थानों के चक्कर लगाने पड़े और उनकी पूरी ऊर्जा उन्हें छुड़ाने में लगी। यह भी एक वजह है कि इस साल लड़कियों की बचीखुची सरगर्मी इस साल के छात्र संघ चुनाव में हवा होती नजर आई क्योंकि उनके परिजनों ने अपने नाम का नया बखेड़ा मोल नहीं लेने में ज्यादा भलाई समझी, जिस कारण छात्राएं बेहद सीमित संख्या में वोट डालने घरों से निकलीं।

इसका एक नतीजा यह भी रहा कि चुनाव से पहले जहां इस साल पंजाब विश्वविद्यालय परिसर में मतदान फीसद के पहले के मुकाबले ज्यादा बेहतर दर्ज किए जाने के कयास लगाए गए थे, वे सभी दावे-प्रतिदावे खोखले साबित हुए और इस साल छात्रसंघ चुनाव का मतदान फीसद काफी कम रह गया।
तीसरा पहलू यह कि गत 7 सितंबर, 2017 यानी चुनाव के रोज गुरुवार के बाद लंबे सप्ताहांत का लाभ उठाने की मंशा से ज्यादातर छात्रावास खाली हो गए, जिसका नुकसान भी छात्र संगठन चुनाव में हुआ। विशेषकर इस बात की रोशनी में कि पंजाब विश्वविद्यालय परिसर में पढ़ने वाली लड़कियों का फीसद 70 रहता है जिन्हें वैसे भी छात्र संघ चुनाव में लड़कों के मुकाबले दिलचस्पी कम ही रहती है। इसी काबिलेगौर पहलू को यह बात भी तस्दीक करती है कि लड़कियों की चुनाव के प्रति बेरुखी ने किसी लड़की को आज तक यहां प्रधान पद पर काबिज होने ही नहीं दिया और हर बार प्रधानी का ताज लड़के के ही सिर सजता आया है।

 

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