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पिता चलाते हैं रिक्शा, बेटे को पढ़ाने के नहीं थे पैसे, पर आज गरीबों को मुफ्त पढ़ाता है बेटा

मिथुन कुमार के पास पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे इसलिए उन्हें पार्ट-टाइम जॉब करनी होती थी।
मिथुन कुमार अपने स्कूल के बच्चों के साथ। (तस्वीर- फेसबुक प्रोफाइल से)

मिथुन कुमार अपने गांव और उसके आसपास के लिए एक मिसाल बन चुके हैं। उन्होंने न ही आईआईटी-आईआईएम की परीक्षा पास की है और आईएस-आईपीएस चुने गये हैं। उन्होंने कोई दूसरा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी नहीं जीता है। फिर एक रिक्शाचालक के 23 वर्षीय बेटे में ऐसा क्या है जिससे दूसरे उन्हें आदर्श मानें! जवाब सीधा और सरल है। गरीबी और अभाव के बीच छोटी-मोटी नौकरियों के जरिए अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले मिथुन ने निजी करियर पर ध्यान देने के बजाय अपने गांव के गरीब बच्चों को शिक्षित करने के बीड़ा उठाया। आज उनके स्कूल में 170 बच्चे हैं जिनका भविष्य मिथुन के त्याग की नींव पर आकार पा रहा है।

मिथुन पंजाब के नांगली गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता रिक्शा चलाते हैं और माँ दूसरों के घरों में काम करती हैं। खुद मिथुन बचपन में चाय की दुकान पर काम कर चुके हैं। जब बहुत इसरार करने पर पास के स्कूल में उनका नाम लिखाया गया तो भी फीस वगैरह के लिए उन्हें पार्ट-टाइम काम करना पड़ता था। मुश्किल हालात में शिक्षा हासिल करने वाले मिथुन ने करीब आठ साल पहले गांव के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। उन्होंने शुरुआत के खाली पड़ी जमीन पर खुले आसमान के नीचे बच्चों को पढ़ाने से की थी। आज आठ साल बाद वो पक्की इमारत तैयार कर चुके हैं। उनके स्कूल के सभी 170 बच्चों को वो स्कूल की पोशाक और किताब-कॉपी उपलब्ध कराते हैं।

मिथुन कुमार के इस निस्वार्थ समाजसेवा की खबर धीरे-धीरे आसपास फैलने लगी। इसकी भनक जब मीडिया को लगी तो उन पर विशेष रिपोर्टें प्रकाशित हुईं और राष्ट्रीय टीवी चैनलों तक ने उन पर विशेष कार्यक्रम दिखाए। मीडिया में लोकप्रियता मिलने के बावजूद मिथुन अनवरत अपना काम जारी रखे हुए हैं। उनका स्कूल दूसरों से प्राप्त आर्थिक मदद और उनकी अपनी कमायी से चलता है। वो शादियों में वेटर के तौर पर काम करते हैं।

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