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अल्प विस्मृति की शिकार तो नहीं भाजपा!

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने छेड़छाड़ के आरोपी विकास बराला के पिता सुभाष बराला के पक्ष में उतरते हुए कहा कि इस घटना के लिए सुभाष बराला को दंडित नहीं किया जा सकता।
Author नई दिल्ली | August 9, 2017 03:01 am
चंडीगढ़ में आईएएस अफसर की बेटी की कार का पीछा करने का आरोपी विकास बराला।

चंडीगढ़ की वर्णिका कुंडू और उनका परिवार न्याय के लिए मोर्चे पर डटे हैं। पर दूसरी तरफ इस मामले के आरोपी हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे के पक्ष में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी खड़ी दिख रही है, उससे न सिर्फ सरकार का बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा धुंधला रहा है बल्कि उसकी नीयत पर भी सवाल उठ रहे हैं।
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने छेड़छाड़ के आरोपी विकास बराला के पिता सुभाष बराला के पक्ष में उतरते हुए कहा कि इस घटना के लिए सुभाष बराला को दंडित नहीं किया जा सकता। यही सुर पार्टी के हरियाणा प्रभारी अनिल जैन का भी रहा। इस मामले में चंडीगढ़ भाजपा के उपाध्यक्ष रामबीर भाटी पूछते हैं कि इतनी रात को वह लड़की घर से बाहर क्या कर रही थी?ऐसा लगता है कि सरकार को अल्प विस्मृति ने घेर रखा है। इसलिए उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत पड़ रही है कि जेसिका लाल हत्याकांड में अपने दोषी बेटे  की वजह से हरियाणा के नेता विनोद शर्मा को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था।

यह बात 1999 की है। जेसिका लाल हत्याकांड में कांग्रेस नेता विनोद शर्मा पर एक गवाह को घूस देने का आरोप लगा था और उनके बेटे मनु शर्मा को अदालत ने दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। जब विनोद शर्मा को कांग्रेस पार्टी छोड़नी पड़ी तब वह अंबाला सिटी से विधायक थे। फिर वह 2004 में कांग्रेस से दोबारा जुड़े। इसी प्रदेश में जब विनोद शर्मा का भाजपा में आना लगभग तय हो चुका था, ठीक उसी समय सुषमा स्वराज ने एक ट्वीट किया और उसने भाजपा में उनके आने का रास्ता बंद कर दिया। सुषमा स्वराज जो स्वयं हरियाणा की बेटी हैं, इस मुद्दे पर हैरतअंगेज तरीके से खामोश हैं। हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला और उनके बेटे विकास बराला के मुद्दे पर उनके ट्वीट को शायद शब्द नहीं मिल रहे।
हरियाणा के वरिष्ठ मंत्री हैं अनिल विज। अपने बयानों की वजह से अक्सर सुखिर्यों में रहते रहे हैं। नोटबंदी के वक्त उन्होंने कहा था कि बापू की छवि से खादी को कोई लाभ नहीं मिला, और नोटों का अवमूल्यन भी हो गया। उनके इस बयान से भाजपा को भी किनारा करना पड़ा था। इसी तरह आतंकवाद का मुद्दा हो या गोरक्षा का, गीता पढ़ाए जाने का मामला हो या योग का, हर मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखने वाले अनिल विज इस बार रात में हुई छेड़छाड़ के मुद्दे पर आंखें मूंदे शांत हैं।

अब बात चंडीगढ़ की सांसद किरण खेर की, जिन्होंने इस वारदात से कुछ रोज पहले लोकसभा में शून्यकाल के दौरान यह मांग की थी कि घूरने के मामले को ‘महिला के साथ हिंसा’ के केस की तरह लिया जाना चाहिए। उन्होंने पूछा था कि घूरने वाले को क्या आप तब तक दोषी नहीं मानेंगे जब तक कि वह हत्यारा नहीं बन जाए? वही किरण खेर आज वर्णिका कुंडू के मामले में अपने ‘पार्टीपुत्र’ के साथ थोड़ी कोमल आवाज के साथ खड़ी दिख रही हैं। वह कहती हैं कि इस वक्त मैं एक मां के रूप में पीड़ित परिवार की भावना समझ सकती हूं। यही समस्या है कोई मां की हैसियत से तो कोई पिता की हैसियत से वर्णिका के साथ है। आज तो बराला ने भी कह दिया कि वर्णिका उनकी बेटी जैसी है। लेकिन पार्टी मंचों पर सब खामोश हैं। पुलिस पर उठ रहे सवालों पर उनका कहना है कि पुलिस अपना काम कर रही है। पर इस मामले में चंडीगढ़ पुलिस के बयान बदल रहे हैं। आरोपों की धाराएं बदल रही हैं और सवालों से घिर कर पुलिस खुद की बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस से भाग रही है। मीडिया के दबाव के चलते सीसीटीवी फुटेज सामने आए वरना तीन दिन अंधेरे में रखा गया।
हर बार की तरह इस मुद्दे पर भी प्रधान स्वर नहीं सुनने को मिला। एक बार फिर याद दिलाने की जरूरत है कि सप्रग शासनकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री की चुप्पी को लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने ‘मौनमोहन’ कह कर जो हमला किया था, उससे लगा था कि हमें एक मुखर सरकार मिलने वाली है। नैतिकता के स्तर पर एक नए युग की शुरुआत होने वाली है। हम हर गंभीर मुद्दे पर अपने प्रधान की आवाज सुन सकेंगे, उनकी राय जान सकेंगे। पर अफसोस कि इस बार भी हमारे प्रधान की आवाज इस मुद्दे पर नहीं आई है। इतने गंभीर मुद्दों पर पसरी चुप्पी देख यही लगता है कि ‘अबकी बार भुलक्कड़ सरकारह्ण। या हो सकता है कि इस बार भी आवाज निकले पर देर से और चौकस। बहरहाल, चाल चरित्र और चेहरे के लिए दावे के साथ सत्ता में आई भाजपा के सिपहसालार एक-एक करके उससे किनारा करते दिख रहे हैं।

 

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