January 19, 2017

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बंगाल की पूजा पर चढ़ा सियासी चापलूसी का रंग

बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा पर राजनीतिक रंग तो राज्य की वाममोर्चा सरकार के जमाने में ही चढ़ गया था, लेकिन इस बार इसमें राजनीतिक चापलूसी का नया आयाम भी जुड़ गया है।

बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गापूजा पर राजनीतिक रंग तो राज्य की वाममोर्चा सरकार के जमाने में ही चढ़ गया था, लेकिन इस बार इसमें राजनीतिक चापलूसी का नया आयाम भी जुड़ गया है। पूरे साल के दौरान देश-दुनिया में घटने वाली घटनाएं पूजा के दौरान पंडालों की साज-सज्जा और बिजली की सजावट के जरिए प्रतिबिंबित होती हैं। लेकिन हर साल एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ में जुटे आयोजकों ने अबकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ही दुर्गा का दर्जा दे दिया है। ममता बनर्जी एक जगह मां के रूप में खड़ी नजर आ रही हैं तो दूसरी जगह मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने याचक के रूप में। इसके अलावा पूजा पंडालों में कहीं चांद पर बस्ती की कल्पना को साकार किया गया है तो कहीं मैडम तुसाद के संग्रह को पंडाल में उतार दिया गया है। पहले तीन दिनों तक चलने वाले यह त्योहार अब दस दिनों तक फैल गया है।
नदिया जिले के चाकदा में स्थानीय प्रांतिक क्लब के पंडाल में दुर्गा की प्रतिमा की जगह दस हाथों वाली ममता बनर्जी की प्रतिमा लगी है। उनकी सफेद-नीली साड़ी वाली प्रतिमा के दस हाथों में राज्य सरकार की ओर से शुरू की गई तमाम योजनाओं के ब्योरे हैं और पृष्ठभूमि में बंगाल का नक्शा। यह प्रतिमा महिषासुर के प्रति उतनी आक्रामक नहीं नजर आती। मां, माटी और मानुष की जगह अब इलाके में मां ममता और मानुष का नारा उछल रहा है।

इसी तरह महानगर के भवानीपुर क्लब की पूजा में ममता बनर्जी को दुर्गा की प्रतिमा के सामने घुटनों के बल बैठकर आशीर्वाद लेते दिखाया गया है। दुर्गा का एक हाथ ममता की की प्रतिमा के सिर पर है। पूजा के आयोजकों में से एक और स्थानीय तृणमूल कांग्रेस पार्षद असीम बसु इसका बचाव करते हुए कहते हैं कि लोग अपने हिसाब से इसकी जो चाहे व्याख्या कर सकते हैं। लेकिन हमने इसके जरिए महिला सशक्तीकरण को दिखाने का प्रयास किया है। हर साल की तरह अबकी इस प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाएगा। वजह यह है कि उस सूरत में ममता की प्रतिमा को भी विसर्जित करना होगा। इसी वजह से आयोजकों ने इस प्रतिमा को संरक्षित रखने का फैसला किया है।

वैसे, राज्य में सामयिक घटनाओं के आधार पर दुर्गा या असुर के चेहरों में मामूली बदलाव पहले भी होता रहा है। मिसाल के तौर पर वर्ष 1971 में बांग्लादेश की लड़ाई के समय बनने वाली ज्यादातर प्रतिमाओं का चेहरा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता था। इसी तरह वर्ष 2001 में ज्यादातर असुरों का चेहरा ओसामा बिन लादेन से मिलता-जुलता बनाया गया था और वर्ष 2003 में इराक युद्ध के समय सद्दाम हुसैन से। लेकिन इससे पहले कभी दुर्गा की कोई प्रतिमा किसी राजनेता से हूबहू मिलती-जुलती नहीं बनी थी।
नदिया जिले में ममता की शक्ल में बनी प्रतिमा को देखने के लिए लोगों की भीड़ तो उमड़ रही है। लेकिन इस पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है। फिलहाल ममता ने खुद या उनकी पार्टी के किसी नेता ने इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है। एक स्थानीय वकील दिलीप कर्मकार कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में मोदी और तेलंगाना में सोनिया गांधी के मंदिर बनने के बाद वह बंगाल भी उसी राह पर चल पड़ा है जिसके बारे में कभी कहा जाता था कि बंगाल जो आज सोचता है, वह बाकी देश कल सोचता है। तृणमूल के कई कट्टर समर्थक भी इस बारे में कुछ बोलने से कतरा रहे हैं। एक समर्थक कृष्णेंदु का कहना था कि ममता बनर्जी जैसी जमीन से जुड़ी नेता को भगवान का दर्जा ठीक नहीं है। इसके बाद अगले साल कई अन्य आयोजक भी इसी राह पर चल पड़ेंगे। इस पर रोक लगनी चाहिए। इसके अलावा यह लोगों की भावनाओं का अपमान है।

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First Published on October 7, 2016 1:35 am

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