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फलोदी की गर्मी और धूल-मिट्टी के बीच हो रही विद्युतीकरण की क्रांति

यदि यह प्रयोग काम कर जाता है तो यह उन मकानों तक बिजली पहुंचाने का मॉडल बन सकता है, जिन्हें ग्रिड से जोड़ना मुश्किल है
Author नई दिल्ली | June 6, 2016 04:19 am
प्रतीकात्मक फोटो।

थार मरूस्थल के किनारे पर स्थित लिखमासर गांव के किसान शैतानराम ने इस साल पहली बार अपने घर में बिजली के लाभों का स्वाद चखा है। वह कहते हैं ‘उनके परिवार के पांच सदस्यों ने वाकई नया सवेरा देखा है।’ वह आइआइटी मद्रास की अगुआई वाली नई तकनीक के शुरुआती लाभान्वितों में से एक हैं। यह तकनीक उन 30 करोड़ भारतीयों के जीवन को रोशन करने का वादा करती है, जो आज भी बिजली आपूर्ति से वंचित हैं। यह भारतीय तकनीक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी लाती है और यह पर्यावरण के बेहद अनुकूल है। इसलिए विद्युत मंत्रालय आइआइटी मद्रास की इस तकनीक के क्षेत्रीय परीक्षण पर जोर दे रहा है।

शैतानराम के खेड़े में 58 मकान हैं और यह राजस्थान के छोटे से शहर फलोदी का हिस्सा है। यह वही इलाका है, जो हाल ही में 51 डिग्री सेल्सियस तापमान के चलते सुर्खियों में आ गया था। यह तापमान भारत में दर्ज अब तक का सबसे ज्यादा तापमान है। फलोदी की गर्मी और धूल-मिट्टी के बारे में ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है, उसी तरह वहां विद्युतीकरण की चुपचाप क्रांति भी हो रही है।

आइआइटी मद्रास के कुछ ऊर्जावान इंजीनियर वहां डीसी (डायरेक्ट करंट) का इस्तेमाल करके घरों को रोशन कर रहे हैं। वैसे पूरे भारत में एसी (अल्टरनेटिंग करंट) का इस्तेमाल करके बिजली पहुंचाई जाती है। ऐसे में जोधपुर जिले के रेतीले इलाके में बिजली आपूर्ति का नया तरीका बेहतर बनाया जा रहा है। आइआइटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर भास्कर राममूर्ति ने इसे परिवर्तनकारी तकनीक कह कर पुकारा। उन्होंने कहा, ‘यह कोई नया आविष्कार नहीं है लेकिन दुनिया ने घरों को रोशन करने के लिए डीसी बिजली का इस्तेमाल छोड़ दिया था।’

बिजली की कमी से जुड़ी मुश्किलों को हल कर सकने वाले इस उपाय में बहुत सी संभावनाएं हैं और यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वादे का प्रमुख चालक बल बन सकता है, जिसके तहत उन्होंने वर्ष 2022 तक हर घर में बिजली पहुंचाने की बात कही है। यह खासतौर पर दूरदराज के गांव खेड़ों में बिजली पहुंचाने का उपयुक्त माध्यम बन सकता है।

आइआइटी मद्रास से शिक्षित एवं फलोदी परियोजना की परियोजना प्रबंधक सुरभि महेश्वरी ने कहा कि पूरा ‘इन्वर्टर विहीन तंत्र’ स्थापित करने में लगभग 25 हजार रुपए की लागत आती है।

वह कहती हैं कि गर्मी के चरम के दौरान भी आइआइटी मद्रास का यह तंत्र खराब नहीं हुआ और यह स्थानीय लोगों तक जरूरी राहत पहुंचाने में कामयाब रहा। फलोदी के हर लाभान्वित मकान को एक छत का पंखा, एक एलईडी ट्यूबलाइट, एक एलईडी बल्ब और फोन चार्ज करने का एक प्वाइंट मिला है। ये सभी डीसी से संचालित होते हैं। अब तक 1800 घरों को सफलतापूर्वक जोड़ा जा चुका है और अन्य 2200 मकानों को अगले कुछ माह में जोड़ दिया जएगा। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो यदि हर घर को ग्रिड बिजली से जोड़ा जाता तो प्रति मकान आने वाला खर्च एक लाख रुपए से ज्यादा होता।

आइआइटी मद्रास ने इस तकनीक पर दक्षता तो पिछले कुल साल में ही हासिल कर ली थी लेकिन इसका प्रमाण तब मिला जब वर्ष 2015 में चेन्नई में आई भीषण बाढ़ के दौरान इसने राज्य में काम करना शुरू किया। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अशोक झुनझुनवाला ने अपने घर पर 125 वाट का छोटा सौर तंत्र लगाया है। उन्होंने याद किया कि भारी बारिश के बाद चेन्नई स्थित आइआइटी परिसर में तीन दिन तक बिजली नहीं थी। सिर्फ एक ही घर में लगातार बिजली आ रही थी और वह घर उनका अपना था क्योंकि वहां उन्होंने ‘विकेंद्रीकृत डीसी सौर तंत्र’ लगाया हुआ था। उन्होंने कहा ‘आइआइटी मद्रास द्वारा विकसित यह महत्त्वपूर्ण तकनीक बिजली का इस्तेमाल करने का बेहद दक्ष तरीका है।’

झुनझुनवाला का मानना है कि यदि आइआइटी मद्रास का यह प्रयोग काम कर जाता है तो यह उन सुदूर मकानों तक बिजली पहुंचाने का मॉडल बन सकता है, जिन्हें ग्रिड से जोड़ना मुश्किल है। शहरों तक में अपार्टमेंटों में भी इस ‘इन्वर्टर विहीन’ व्यवस्था का इस्तेमाल करके लंबे समय तक बिजली गुल होने पर या आपदा की स्थितियों में बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। झुनझुनवाला ने कहा, ‘डीसी के बारे में फिर विचार करने के लिए सोच में बदलाव जरूरी है।’

यह दरअसल 19वीं सदी में दो महान अमेरिकी आविष्कारकों- निकोला टेस्ला और थॉमस एडीसन के बीच की लड़ाई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि दुनिया ने अल्टरनेटिंग करंट को अपना लिया। टेस्ला एसी बिजली की आपूर्ति पर जोर दे रहे थे और अंतत: जॉर्ज वेस्टिंगहाउस के समर्थन से उन्होंने इसे मानक बनाने में सफलता हासिल कर ली। झुनझुनवाला कहते हैं कि यदि विक्रेंद्रीकृत सौर डीसी बिजली को व्यापक स्तर पर अपनाए जाने के लिए बढ़ावा दिया जाता है तो इससे लंबे समय तक गुल रहने वाली बिजली की समस्या का एक टिकाऊ हल मिल सकता है।

फलोदी में बढ़ते तापमान के साथ हो रही है विद्युतीकरण की खामोश क्रांति-

  • इस तकनीक से 1800 घरों को रोशन किया जा चुका है और अन्य 2200 मकानों को अगले कुछ महीने में रोशन किया जाएगा
  •  हर लाभान्वित घर को एक पंखे, एक एलईडी ट्यूबलाइट, एक एलईडी बल्ब और एक फोन चार्ज करने के प्वाइंट मिले हैं
  • गर्मी के चरम के दौरान भी आइआइटी मद्रास का यह तंत्र खराब नहीं हुआ और लोगों को जरूरी राहत पहुंचाने में कामयाब रहा
  • यदि यह प्रयोग काम कर जाता है तो यह उन मकानों तक बिजली पहुंचाने का मॉडल बन सकता है, जिन्हें ग्रिड से जोड़ना मुश्किल है
  • शहरों तक में ‘इन्वर्टर विहीन’ व्यवस्था का इस्तेमाल करके लंबे समय तक बिजली गुल होने पर बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है

क्या है तकनीक?

एक वर्ग मीटर का एक सोलर पैनल दिया जाता है। इस पैनल से पैदा होने वाली बिजली को चार लेड एसिड बैटरियों में संग्रहित किया जाता है। ऐसे में एसी बिजली पर चलने वाले उपकरण डीसी बिजली पर चल जाते हैं। सौर ऊर्जा से चलने वाले अधिकतर उपकरणों में बैटरी बैकअप वाले सिस्टम ‘इन्वर्टर’ लगाने पड़ते हैं, जो डीसी को एसी बिजली में बदलता है ताकि सामान्य बिजली उपकरण चलाए जा सकें। फलोदी ने यह ‘आॅफ ग्रिड’ व्यवस्था पूरी तरह ‘इन्वर्टर विहीन तंत्र’ पर चलती है। यह पूरे तंत्र को 25-30 प्रतिशत ज्यादा दक्ष बनाता है और बिजली उपभोग में लगभग 50 प्रतिशत की कमी लाता है।

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