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इशरत मामले में चिदंबरम ने कहा दूसरे हलफनामे में कुछ भी गलत नहीं

चिदंबरम ने कहा- मुझे बताएं कि हलफनामे का कौन सा हिस्सा, वाक्य या शब्द कानूनी, नैतिक या राजनीतिक रूप से गलत है।
Author मुंबई | June 1, 2016 00:48 am
पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम। (फाइल फोटो)

इशरत जहां मुठभेड़ मामले में दूसरे हलफनामे का मसौदा तैयार करने में कथित भूमिका के लिए भाजपा के हमले का सामना कर रहे पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने मंगलवार को कहा कि उस हलफनामे में कानूनी, राजनीतिक या नैतिक रूप से कुछ भी गलत नहीं था। इस हलफनामे में कहा गया था कि इस बात को साबित करने के लिए कोई अकाट्य प्रमाण नहीं था कि वह आतंकी थी।

चिदंबरम ने पत्रकारों से कहा कि हलफनामा तब दायर किया गया था, जब अमदाबाद के मेट्रोपोलिटन न्यायाधीश एसपी तमांग की सितंबर, 2009 की रिपोर्ट में कहा गया था कि मुठभेड़ फर्जी थी। बाद की जांचों में भी कहा गया था कि मरने वाले लोग पुलिस हिरासत में थे और उनके पास से बरामद हथियार पुलिस ने रखे थे। यह जांच पहले एसआइटी और फिर सीबीआइ ने की थी। उन्होंने कहा- विवरण कहता है कि यह फर्जी मुठभेड़ थी। जो लोग मारे गए थे वे दो-तीन दिन से हिरासत में थे। उनकी मध्य रात्रि में उस समय हत्या की गई, जब वे कार में बैठे थे। यह सब एक न्यायाधीश का निष्कर्ष है।

उन्होंने कहा कि हलफनामे में सिर्फ पांच-छह पैरे हैं। दूसरे पैरे में यह कहता है कि क्यों नया हलफनामा दायर किया जा रहा है और पांचवें पैरे में कहा गया है कि भारत सरकार नियमित रूप से राज्यों के साथ खुफिया सूचना साझा करती है। उन्होंने कहा कि खुफिया सूचना सिर्फ खुफिया सूचना होती है। यह अकाट्य साक्ष्य नहीं होता। खुफिया सूचना के आधार पर आप किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। इसकी जांच की जानी चाहिए और अदालत में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। पूर्व गृह मंत्री का बयान इन अटकलों के बीच आया है कि इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की लापता फाइलों की जांच के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की गठित एक सदस्यीय जांच समिति अपनी रिपोर्ट जल्द सौंप सकती है। उन्होंने कहा- यह समझ से परे है कि क्यों कुछ फाइलें गायब हैं। तमिलनाडु कैडर के आइएएस अधिकारी बीके प्रसाद की अध्यक्षता वाली समिति का गठन इस साल 14 मार्च को किया गया था।

चिदंबरम ने कहा- मुझे बताएं कि हलफनामे का कौन सा हिस्सा, वाक्य या शब्द कानूनी, नैतिक या राजनीतिक रूप से गलत है। इस हलफनामे को भारत के महान्यायवादी ने भी देखा था। गृह मंत्रालय से जो दस्तावेज गायब हुए हैं उनमें अटॉर्नी जनरल के जांचे गए हलफनामे की प्रति भी शामिल है, जिसे 2009 में गुजरात हाई कोर्ट को सौंपा गया था और दूसरे हलफनामे का मसौदा जिसमें बदलाव किए गए थे। उन्होंने कहा कि पहला हलफनामा महाराष्ट्र और गुजरात पुलिस से मिली सूचना के अलावा खुफिया ब्यूरो की सूचना के आधार पर दायर किया गया था, जिसमें कहा गया था कि मुंबई के बाहरी इलाके की 19 साल की लड़की इशरत लश्करे तैयबा की आतंकवादी थी लेकिन दूसरे हलफनामे में इसकी अनदेखी की गई थी।

सूत्रों के मुताबिक दूसरे हलफनामे के बारे में दावा है कि तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने इसका मसौदा तैयार किया था। उसमें कहा गया था कि इस बात को साबित करने के लिए अकाट्य सबूत नहीं हैं कि इशरत आतंकी थी। पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लै ने दावा किया था कि गृह मंत्री के तौर पर चिदंबरम ने अदालत में मूल हलफनामा दायर किए जाने के एक महीने बाद फाइल को वापस मंगाया था। मूल हलफनामे में कहा गया था कि इशरत और उसके साथ मारे गए उसके अन्य साथी लश्कर के आतंकी थे। बाद में चिदंबरम ने कहा था कि हलफनामे में बदलाव के लिए पिल्लै भी समान रूप से जिम्मेदार हैं।

इशरत, जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लै, अजमद अली अकबर अली राणा और जीशान जौहर को गुजरात पुलिस ने 15 जून, 2004 को अमदाबाद के बाहरी इलाके में मुठभेड़ में मार गिराया था।

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