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‘कानून के हाथ रसूख से लंबे होते हैं’

कानून के हाथ रसूख से लंबे होते हैं। साकेत स्थित मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अंकिता लाल की अदालत में शुक्रवार को यह साफ हो गया कि जीत आखिर सत्य की ही होती है।
Author नई दिल्ली | May 20, 2017 01:32 am
(एक्सप्रेस फोटोो)

कानून के हाथ रसूख से लंबे होते हैं। साकेत स्थित मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अंकिता लाल की अदालत में शुक्रवार को यह साफ हो गया कि जीत आखिर सत्य की ही होती है। तीन साल की कानूनी लड़ाई और फरारी के बाद आखिरकार आरोपी महिला पूजा कौशिक शुक्रवार को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को सौंप दी गई। अब पीड़ित परिवार को अदालत से ‘अंतिम न्याय’ की आस है। यह मामला एक परिवार के बिखरने और कानून के बेजा इस्तेमाल से जुड़ा है। इसकी लड़ाई लड़ने वाले पीड़ित सतीश शर्मा के मुताबिक रसूखदार मायके की लड़की पूजा की ससुराल से अलग रहने की ख्वाहिशें जब उसके पति ने नहीं मानी तो उसने न केवल अपने ससुर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498 (ए), 364 (बाद में 376 में परिवर्तित), 406, 34 के तहत छेड़छाड, बलात्कार और दहेज मामला दर्ज कराया बल्कि उन्हें जेल भी भिजवाया। परिवार का मुखिया जेल चला गया और पूरा परिवार सड़क पर आ गया। इतना ही नहीं पूजा ने अपने पिता (रामबीर कौशिक), जो उस समय सेना के सिग्नल यूनिट के सुबेदार हुआ करते थे, के रसूख का इस्तेमाल कर ससुराल वाले घर का सारा सामान दहेज बता कर उठवा लिया। हद तो तब हो गई, जब कई चीजों के फर्जी बिल लगाकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई कि ये समान उन्होंने दहेज के लिए खरीदा और दिया था। महिला ने 50 लाख रुपए खर्चने का भी दावा किया था।

16 दिन तिहाड़ में रहने के बाद पीड़ित सतीश शर्मा ने इसका पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया। वकील विनय कुमार जैन की अगुआई में यह मामला फिर अदालत में लाया गया। अदालत ने दहेज के सामान की हुई खरीदारी के जांच के आदेश दिए। पुलिस ने जब जांच की तो चौकाने वाले तथ्य सामने आए। सुबेदार रामबीर कौशिक ने दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा कर अदालत में फर्जी बिल प्रस्तुत किए थे। मसलन दवाई की दुकान से गहने खरीदने का फर्जी बिल बनवाकर पैसे भुनाने और अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई थी। जब पुलिस बिल के सत्यापन के लिए दुकान के पते पर पहुंची तो सन्न रह गई। वह दुकान आभूषण की नहीं, दवाई व मेडिकल उपकरण बेचे जाने की दुकान थी। अदालत ने इसे गंभीरता से लिया। इसके बाद रामबीर के खिलाफ जालसाजी और अदालत को गुमराह करने का मुकदमा दर्ज किया गया है। पुल प्रहलादपुर थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471, 506/34 के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसके बाद पूजा और उनके पिता के खिलाफ वारंट जारी किए।

महिला अधिकार की दुहाई देने वाली पूजा व उनके पिता भूमिगत हो गए। वे गिरफ्तारी से राहत के लिए निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए। लेकिन उन्हें कहीं राहत नहीं मिली। इस मामले की पैरोकार रहीं दिल्ली हाई कोर्ट की वरिष्ठ वकील रीबेका एम जोंस, वकील विशाल गोसार्इं के मुताबिक जस्टिस विपिन सांघी की पीठ से जमानत निरस्त होने के बाद दोनों आरोपी सुप्रीम कोर्ट भी गए। वहां से भी भारत के मुख्य न्यायधीश जेएस केहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने उनकी राहत की अपील वाली ‘विशेष अनुमति याचिका’ खारिज की। उन्हें खुद को हाजिर करने का निर्देश दिया। वे फिर भी फरार रहे। इस बीच मामला दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को सौंप दिया गया। शुक्रवार को पूजा की अदालत में समर्पण के बाद गिरफ्तारी हुई। उसे अदालत ने अपराध शाखा को रिमांड पर सौंप दिया। दूसरे आरोपी फरार हैं। पुलिस का कहना है कि वे भी जल्द गिरफ्त में होंगे। दहेज कानून का बेजा इस्तेमाल का शिकार बने पीड़ित सतीश शर्मा ने अदालत के बाहर कहा कि उनकी प्रतिष्ठा तो वापस नहीं आएगी लेकिन समाज यह देख सकेगा कि कानून का किस स्तर पर गलत उपयोग हो रहा है। अब अंतिम न्याय की आस है। गिरफ्तार पूजा के पति ने कहा कि हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। ताकि हम रिश्तेदारों के सामने फिर खड़ा हो सकें। वे कहते हैं कि मामला चार जजों के सामने से गुजरा। तीन साल तक करीब आधा दर्जन वकीलों के तर्क के बाद मामला दूध का दूध और पानी का पानी हुआ। लेकिन यह कितने लोग कर पाएंगे, बड़ा सवाल यही है।

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