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शेहला राशिद का JNU पर आरोप – आधार कार्ड नहीं है इसलिए लौटा दिया मेरा एमफिल का शोध पत्र

हालांकि, विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि उन्होंने 20 अप्रैल को एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया है कि विशिष्ट पहचान पत्र / आधार और फोटोग्राफ के साथ प्रमाण पत्र जमा किया जाना चाहिए।
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला राशिद। (Photo: Facebook)

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला राशिद ने शुक्रवार (11 अगस्त) को आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय ने उनका शोध निबंध स्वीकार नहीं किया क्योंकि उन्होंने संबंधित पत्र पर आधार क्रमांक नहीं लिखा था। राशिद ने कहा, ‘‘जेएनयू प्रशासन ने मेरा शोध निबंध मेरे केंद्र को भेज दिया क्योंकि मैंने संबंधित पत्र पर अपने आधार क्रमांक का उल्लेख नहीं किया था।’’ उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय पिछले दरवाजे से आधार को आगे बढ़ा रहा है जबकि इसके लिए कोई शासनादेश नहीं है।

राशिद की तरह हाल ही में कई अन्य विद्यार्थियों का भी शोध निबंध वापस भेज दिया गया जिन्होंने आधार क्रमांक का उल्लेख नहीं किया था। हालांकि जेएनयू के रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने कहा कि यूजीसी की 21 मार्च की अधिसूचना के बाद आधार का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया है।

इंडिया टूडे की रिपोर्ट के मुताबिक रशीद ने कहा, “मुझे मेरे केंद्र से एक कॉल आई कि विश्वविद्यालय ने मेरे शोध निबंध को वापिस भेज दिया। क्योंकि मैं आवेदन में आधार नंबर नहीं लिखी थी। मेरे पास आधार कार्ड नहीं है, और मुझे लगता है कि शैक्षणिक क्षेत्र में यह अनिवार्य भी नहीं है। यह एक तरह का छात्रों को परेशान करने का प्रयास है।”

इस मामले पर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कमल मित्र चेनॉय ने कहा कि शोध निबंध को स्वीकार करने के लिए आधार होना जरुरी नहीं है। आधार की आवश्यकता मुख्य रुप से बैंक में लेन-देन के लिए पड़ती है। शैक्षणिक आवश्यकताओं के लिए पहले ही कोर्ट स्पष्ट विवरण दे चुका है।

यूनिवर्सिटी के एक अधिकारी ने बताया कि शोध निबंध वापिस किया गया है, क्योंकि दो दस्तावेज आवश्यक हैं। एक इंटरनल और दूसरा एक्सटरनल। जोकि मूल्यांकन विभाग को पत्र के साथ भेजा जाता है। निबंध मुख्य रूप से छात्रा, उनके पर्यवेक्षक और विभाग प्रमुख के बीच है। एम फिल निबंध के लिए पीएचडी के लिए सकारात्मक जवाब नहीं हो सकता है, जबकि वे अंतिम निबंध में और बदलाव कर सकते हैं।

हालांकि, विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि उन्होंने 20 अप्रैल को एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया है कि विशिष्ट पहचान पत्र / आधार और फोटोग्राफ के साथ प्रमाण पत्र जमा किया जाना चाहिए। यूजीसी ने मार्च में इस पर एक परिपत्र जारी किया था। बता दें कि उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार (1 अगस्त) को कहा कि सार्वजनिक दायरे में लोगों की निजी सूचनाओं की संरक्षा के लिये अतिमहत्वपूर्ण दिशानिर्देशों की आवश्यकता है ताकि इनका इस्तेमाल सिर्फ नियत उद्देश्य के लिये ही किया जाये।

संविधान पीठ इस सवाल पर विचार कर रही है कि क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? पीठ ने इस तथ्य का भी जिक्र किया कि भारत ने 1948 के अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं जिसमे निजता को मानवीय अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी है। इस मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार की दलीलों का जिक्र करते हुये न्यायालय ने कहा, ‘‘यदि हम इसे स्वीकार भी कर लें कि संविधान सभा ने इस पर (निजता के मुद्दे) विचार किया था और इसे मौलिक अधिकारों में शामिल करने के विपरीत फैसला किया तो भी आप इस तथ्य से कैसे निबटेंगे कि भारत ने मानव अधिकारों पर यूनीवर्सल घोषणा पर हस्ताक्षर किया है जो इसे मान्यता देता है।’’

देखिए वीडियो - आधार कार्ड: आधार कार्ड को जरूरी बनाने वाली अधिसूचना को पारित करने से सुप्रीम कोर्ट ने किया इंकार

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