December 03, 2016

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नहीं मिला पैसा, मायूसी वाली पहली तारीख

बैंक अकाउंट बैलेंस या चेक की शक्ल में लोगों की तनख्वाह तो आई पर हाथ में नकद नहीं।

Author  नई दिल्ली | December 2, 2016 04:33 am
मोदी सरकार ने 8 नवंबर को नोटबंदी का फैसला लिया था।

महीने की पहली तारीख आते ही निम्न और मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा लोगों की आंखों में चमक आ जाती है कि उनका घर चलाने के लिए तनख्वाह आ गई है। लेकिन, इस बार की पहली तारीख कुछ अलग रही। बैंक अकाउंट बैलेंस या चेक की शक्ल में लोगों की तनख्वाह तो आई पर हाथ में नकद नहीं। लोग दूध, अखबार, केबल टीवी, नौकर, सफाईकर्मी, ड्राइवर और मकान भाड़े के खर्चे के लिए कतारों में खड़े दिखे, बैंकों से ज्यादा एटीएम के सामने कतारें दिखीं क्योंकि बैंकों में नकदी ही नहीं, बैंक चेक के माध्यम से भी 24 हजार की तय रकम नहीं दे पा रहे। और कई लोग जिन्हें नकदी में तनख्वाह मिलती है उनके लिए असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि इस बार कैसे मिलेगी तनख्वाह। वहीं नकदी के अभाव में कहीं-कहीं बार्टर सिस्टम (चीजों की अदला-बदली) भी देखने को मिला।

आॅफिस में मेहनत के फलस्वरूप तनख्वाह चल कर खाते तक तो आ गई, लेकिन अब नकदी हाथ में लाने के लिए एटीएम और बैंकों के चक्कर लगाने की मेहनत अब शुरू है। एलआइसी एजंट के रूप में काम करने वाले सतीश (बदला हुआ नाम) ने कहा कि महीने में दो बार उनके अकाउंट में कमीशन के पैसे ट्रांसफर होते हैं, लेकिन वह निकाल नहीं पा रहे हैं। 28 नवंबर से अपने नाम का तीन चेक लेकर बैंकों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उनकी बारी आने तक नकदी ही खत्म हो जा रहा है।  वहीं पुलिस वायरलेस सेवा में कार्यरत अमित (बदला हुआ नाम) ने कहा कि तनख्वाह तो आ गई है, लेकिन महीने की शुरुआत में इतने खर्चे होेते हैं कि उसे पूरा करने के लिए हफ्ता भर हर दिन एटीएम की कतार में खड़ा होना होगा, तब जाकर जरूरी की नकद राशी निकल पाएगी। यह पूछे जाने पर कि चेक से पैसे क्यों नहीं निकालते, उन्होंने कहा, ‘बैंकों में तो नकद ही नहीं रह पा रही, एक-दो घंटे में खत्म हो जाती है, एटीएम से ही निकल पाने की उम्मीद है’। वहीं आंध्र प्रदेश सरकार की सेवा में दिल्ली में कार्यरत माधवी (बदला हुआ नाम) ने कहा, ‘उन्हें बैंक से चेक के माध्यम मात्र 1000 रुपए मिले, अब इसका मैं क्या करूं और क्या न करूं।’  नोएडा के एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाले राधेश्याम पांडे ने कहा कि उन्हें नकदी में तनख्वाह मिलती है, लेकिन इस बार अभी नहीं मिली है, मालूम नहीं क्या करेंगे, असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

मयूर विहार फेस-1 में स्टेट बैंक के एटीएम के सामने खड़ी घरेलू महिला टीना ने बताया, ‘मैं ज्यादातर काम आॅनलाइन और कार्ड के माध्यम से ट्रांजेक्शन कर चला रही हैं, लेकिन महीने की शुरुआत में कई ऐसे खर्चे होते हैं जिसके लिए नकद जरूरी है, इसलिए कतार में खड़ा होना मजबूरी है, हर दूसरे-तीसरे दिन अब मेरा यही काम है।’    पटपड़गंज मैक्स अस्पताल में काम करने वाले राकेश ने कहा, ‘मुझे संयुक्त परिवार का फायदा मिल रहा है, नहीं तो मैं ड्यूटी छोड़कर कबतक कतार में खड़ा रहूंगा। कभी मां, कभी पत्नी, कभी भाई कतार में लगने आ जाते हैं और 2000 लेकर जाते हैं जिससे काम चल रहा है।’  वहीं महीने की शुरुआत में किराए के घर में रह रहे लोगों की अलग समस्या है, कई मकानमालिकों ने चेक से किराया लेने से मना कर दिया है। मयूर विहार फेस वन में रहने वाली संजीता ने कहा कि उन्होंने एक चौथाई किराया नकद में दिया है बाकि जब स्थिति ठीक होगी तभी दे पाएंगे। हालांकि, उन्होंने अपनी कामवाली को नकद के बदले में घर के जरूरी सामान देने के लिए राजी कर लिया है। उन्होंने कहा, ‘मेरी कामवाली की पगार है तो मात्र आठ सौ रुपए, लेकिन आज यह भी दुलर्भ हो गया है, इससे बेहतर है कि मैं उसकी घरेलू जरूरत की चीजें बिग बाजार या अन्य जगह से लेकर दे दूं’। हालांकि, बेबश जनता नकदी के जुगाड़ या खर्चे निकालने की तरकीबों में लगी है, पर अभी उत्साहियों की कमी नहीं जो इस अतिरिक्त मेहनत के फल के इंतजार में हैं, कालेधन के खिलाफ इस जंग का सकारात्मक असर अपनी बैंक खातों पर पड़ने की उम्मीद में कतार को सलाम कर रहे हैं।

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First Published on December 2, 2016 4:33 am

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