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डीयू : किताबों की फोटोकॉपी पर बैन लगाने पर हाईकोर्ट का इंकार, छात्रों ने जताई खुशी

मेडिकल और इंजीनियरिंग की विदेशी लेखकों की किताबें 8 से 10 हजार तक की हैं। कई बार ये किताबें लाइब्रेरी में भी नहीं होतीं।
Author September 21, 2016 05:02 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

किताबों की फोटो प्रति कर बेचे जाने के खिलाफ विदेशी प्रकाशकों द्वारा लगाई गई याचिका शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। इस फैसले का छात्रों और फोटोकॉपी करने वाले दुकानदारों ने स्वागत किया है। उन्होंने फैसले को छात्रों और शिक्षा क्षेत्र दोनों के हित में दिया गया फैसला बताया है।  विदेशी प्रकाशकों ने 2012 की याचिका में कहा था कि फोटोकॉपी कर उनकी किताबों को बेचा जाना कॉपीराइट कानून का उल्लंघन है। बीसीए की अंतिम वर्ष की छात्रा आंचक श्रीवास्तव बताती हैं कि बाजार में बिकने वाली किताबों की कीमत बहुत ज्यादा है जिन्हें एक-दो टॉपिक पढ़ने के लिए खरीदना बहुत महंगा होता है। अमूमन एक टॉपिक अधिक से अधिक 20 से 40 पन्नों के हैं। इस पर फोटो कॉपी का खर्च 15 से 20 रुपए आता है। ऐसे में 1500 से 2000 रुपए की किताबें खरीदना बहुत महंगा सौदा है।

बीसीए की ही छात्रा कोमल बताती हैं कि यह समस्या हर छात्र की है। उसे पढ़ाई के दौरान कम से कम 35 से 50 किताबों की जरूरत पड़ती है। सेमेस्टर पैटर्न शुरू किए जाने के बाद किताबों से ज्यादा टॉपिक अहम हो गए हैं। ऐसे में प्रकाशकों की ओर से किताब खरीदने का दबाव बनाया जाना शिक्षा को प्रभावित करने जैसा है।
दूसरी ओर इतिहास की प्रथम वर्ष की छात्रा दीपिका रावत बताती हैं कि उन्हें कोर्स से जुड़ी किताबें बाजार में आसानी से नहीं मिलती हैं। ये किताबें भी इतिहास हो चुकी हैं और 20 से 25 साल पुरानी हैं। कुछ किताबें या टॉपिक जिन पर आप अध्ययन करना चाहते हैं वो 50 साल से ज्यादा पुरानी हैं। टॉपिकों के लिए कई बार उन्हें घंटों लाइब्रेरी खंगालनी पड़ती है। ऐसे में फोटोकॉपी छात्रों की मजबूरी है।

इतिहास में बीए कर रहीं सुरभि पांडे ने बताया कि रोहिणी से डीयू के उत्तरी परिसर आती हैं। कई प्रोफेसरों की क्लास अटैंड नहीं पातीं। ऐसे में अगर यह पता चल जाता है कि प्रोफेसर ने किस विषय पर लेक्चर दिया और यह टॉपिक किस किताब में है, तो लाइब्रेरी से लेकर फोटोस्टेट करा कर पढ़ना आसान हो जाता है। इतिहास के द्वीतीय वर्ष के छात्र आदर्श खन्ना ने बताया कि उनके विषय की किताबें बाजार में आसानी से नहीं मिलतीं। आदर्श ने कहा कि किताबें या तो विश्वविद्यालय के विषयों के हिसाब से तैयार की जाएं वर्ना ऐसे प्रतिबंध छात्रों पर थोपे नहीं जा सकते।

इस फैसले पर फोटोकॉपी करने वाले दुकानदारों ने भी खुशी जाहिर की है। मनकीत सिंह ने बताया कि फोटोकॉपी कराना छात्रों का शौक नहीं है। न ही प्रकाशक को जानबूझ कर चूना लगाने के इरादे से किया गया काम है। बल्कि यह उनकी मजबूरी है। मेडिकल और इंजीनियरिंग की विदेशी लेखकों की किताबें 8 से 10 हजार तक की हैं। कई बार ये किताबें लाइब्रेरी में भी नहीं होतीं। हर बच्चा इतनी महंगी किताबें नहीं खरीद सकता। छात्र इन किताबों को तीन से चार सौ रुपए में फोटोकॉपी करा के पढ़ते हैं। वैसे भी सेमेस्टर पैटर्न की शुरुआत होने के बाद छात्रों को किताबें पढ़ने का वक्त कहां मिलता है।

डीयू के उत्तरी परिसर में फोटोकॉपी की दुकान चलाने वाले जगमोहन सिंह और राम लाल ठाकुर ने प्रकाशकों पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि प्रकाशक शैक्षणिक किताबें व्यवस्थित और फोटो कॉपी से सस्ती रखें ताकि छात्रों को फोटोकॉपी की जरूरत ही न पड़े। इससे छात्रों को भी सहूलियत होगी। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय परिसर के आस-पास करीब सौ फोटोकॉपी की दुकानें हैं। बड़ी दुकानों की आमदनी लाखों रुपए महीने की हैं। इन दुकानों के कारण ही हजारों परिवार चलते हैं।

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