ताज़ा खबर
 

दिल्ली में मलेरिया से युवक की मौत, पिछले पांच साल में पहला मामला

प्रवीण को पटपड़गंज स्थित मैक्स अस्पताल से सफदरजंग अस्पताल लाया गया था, जहां मलेरिया से पीड़ित होने का पता लगने के बाद उसे 28 अगस्त को भर्ती कराया गया था।
Author नई दिल्ली | September 7, 2016 06:41 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

सेरेब्रल मलेरिया से पीड़ित पूर्वी दिल्ली के 30 वर्षीय व्यक्ति की मंगलवार को यहां एक अस्पताल में मौत हो गई। राष्ट्रीय राजधानी में पिछले पांच वर्षों में इस वेक्टर जनित बीमारी से होने वाली संभवत: यह पहली मौत है। मंडावली के रहने वाले प्रवीण शर्मा की मलेरिया से जुड़ी समस्याओं के कारण रविवार शाम सफदरजंग अस्पताल में मृत्यु हो गई। सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक एके राय ने कहा, ‘उसे काफी गंभीर स्थिति में अस्पताल लाया गया था और वह पहले से सेरेब्रल मलेरिया से पीड़ित था। कई अंगों के काम करना बंद कर देने और अन्य समस्याओं के चलते उसकी मौत हो गई।’

परिवार के एक सदस्य ने कहा कि प्रवीण को पटपड़गंज स्थित मैक्स अस्पताल से सफदरजंग अस्पताल लाया गया था, जहां मलेरिया से पीड़ित होने का पता लगने के बाद उसे 28 अगस्त को भर्ती कराया गया था। प्रवीण के एक रिश्तेदार राजन शर्मा ने आरोप लगाया कि ‘प्रवीण को मैक्स अस्पताल में 102 डिग्री बुखार के साथ भर्ती कराया गया था लेकिन बाद में उसका बुखार 107 डिग्री तक पहुंच गया। इसके बाद उसे वेंटीलेटर पर रखा गया लेकिन उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई। इसके बाद भी अस्पताल वालों ने हमें इस बारे में कुछ नहीं बताया।’

उधर मैक्स अस्पताल ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा कि जब प्रवीण को लाया गया था, तब वह बेहोश था। उसे तेज बुखार था और सर्दी लग रही थी। उसे उल्टियां भी रही थीं और सांस लेने में दिक्कत थी। अस्पताल के मुताबिक प्रवीण की हालत पर वरिष्ठ डाक्टर नजर रखे हुए थे और मानक प्रोटोकॉल के अनुरूप ही उसका इलाज किया गया। परिवार वालों को भी उसकी बिगड़ती हालत के बारें में समय पर सूचित किया गया था। अस्पताल ने दावा किया कि मरीज के परिजन उसे दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए बहुत दबाव डाल रहे थे, इस पर 2 सितंबर को मरीज को छुट्टी दी गई। राष्ट्रीय वेक्टर जनित बीमारी नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) की वेबसाइट के मुताबिक दिल्ली में जुलाई 2012 से अब तक मलेरिया से किसी की मौत नहीं हुई।

मच्छर से जूझता ‘मलेरिया अंचल’

साल 1954 में प्रकाशित हुए फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल’ में नायक डॉक्टर मलेरिया से जूझ रहे अंचल पर शोध करते हुए बीमारी की जड़ की पहचान करता है। डॉक्टर अपने शोध के बाद कहता है कि मलेरिया की जड़ गरीबी है। बजरिए डॉक्टर रेणु का इशारा है कि जहां गरीबी है, वहां मच्छर है। जब भारत से छोटा और ज्यादा बारिश झेलने वाले देश श्रीलंका को मलेरिया मुक्त करने की घोषणा हुई तभी ‘विश्व शक्ति’ का सपना देख रहे देश की राजधानी दिल्ली में मलेरिया से मौत की खबर आती है। 1954 के बाद से आज तक भारत मलेरिया से मुक्त नहीं हो पाया है। राष्टÑीय मलेरिया उन्मूलन नीति के अनुसार भारत को मच्छर से होने वाली इस बीमारी से मुक्त होने के लिए 2030 तक इंतजार करना होगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश के न्यूनतम या मध्यम खतरे वाले राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों से मलेरिया को 2022 तक समाप्त करना और 2024 तक देश के हर हिस्से में मलेरिया संक्रमण को प्रत्येक हजार व्यक्ति पर एक के आंकड़े को लाना है। इस साल भारत में जुलाई तक मलेरिया के 471083 मामले सामने आ चुके हैं।

सोमवार को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से श्रीलंका को मलेरिया मुक्त घोषित किया गया। वहां इस संक्रामक बीमारी के खिलाफ चलाए अभियान से 10 साल पहले ही मलेरिया के साल भर में सिर्फ 1000 केस सामने आए। यह आंकड़ा 2012 में शून्य हो गया। पिछले साढ़े तीन साल से यहां मलेरिया का कोई मामला सामने नहीं आया है। इसके पहले दक्षिण पूर्व एशिया में मालदीव को 1984 में ही मलेरिया मुक्त घोषित किया गया था। मालूम हो कि 20वीं सदी में श्रीलंका सबसे ज्यादा मलेरिया प्रभावित देशों में शामिल था। वहीं यूरोप दुनिया का पहला ऐसा इलाका है जिसे मलेरिया मुक्त घोषित किया गया है। 1995 में यूरोप में मलेरिया के 90 हजार 712 मामले सामने आए थे। दो दशक में यह शून्य की संख्या पर पहुंच गया।
वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर सातवें शख्स को मलेरिया का खतरा है। देश में मलेरिया से होने वाली कुल मौतों बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
में 90 फीसद ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं। यहां मलेरिया से मौतों के मामले में ओड़ीशा सबसे ऊपर है। पूरी दुनिया में मलेरिया के 80 फीसद मामले भारत, इथोपिया, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में होते हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने आकलन में कहा है कि 2020 तक 21 देश मलेरिया मुक्त हो सकते हैं। इनमें छह देश अफ्रीकी क्षेत्र के और भारत के चार, पड़ोसी देश भूटान, चीन, नेपाल और मलेशिया हो सकते हैं। संगठन के मानक के मुताबिक, मलेरिया मुक्त घोषित करने के लिए किसी देश को 2020 से पहले कम से कम एक साल तक इसका कोई भी मामला नहीं मिलना चाहिए। इस क्षेत्र में हुए अध्ययन दावा करते हैं कि दुनिया की करीब आधी आबादी 3.2 अरब लोगों पर मलेरिया का खतरा बरकरार है। केवल पिछले साल ही 95 देशों से मलेरिया के 21.4 करोड़ नए मामले सामने आए। इस बीमारी से चार लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

भारत के शहर हों या गांव, यहां के नगर निगम और स्थानीय निकाय सिर्फ भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुके हैं। मच्छरों पर नियोजन को लेकर भी प्रभावी ढंग से कार्यक्रम नहीं चल पाते हैं। गांव-कस्बों की बात छोड़ें पॉश इलाकों में भी मच्छरजनित रोगों से लोगों की मौत हो रही है। राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो मच्छरजनित बीमारियों से लड़ने के लिए तीनों नगर निगमों के करीब चार हजार कर्मचारी जुटे हैं। उनके पास करीब 78 करोड़ रुपए का सालाना बजट भी है। फिर भी यहां मच्छरों से हो रही मौतें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। एक मच्छर पर काबू पाए बिना हम देश को सेहतमंद नहीं बना सकते और इस मामले में हम श्रीलंका से भी पिछड़ गए हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.