December 09, 2016

ताज़ा खबर

 

हंगामा है यूं बरपा…

नोटबंदी के लागू होते ही विपक्ष तो जल्द गोलबंद नहीं हो पाया लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर पक्ष और विपक्ष का शीतकालीन सत्र आठ नवंबर को प्रधानमंत्री के एलान के साथ ही शुरू हो गया था।

Author नई दिल्ली | November 19, 2016 00:28 am

नोटबंदी के लागू होते ही विपक्ष तो जल्द गोलबंद नहीं हो पाया लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर पक्ष और विपक्ष का शीतकालीन सत्र आठ नवंबर को प्रधानमंत्री के एलान के साथ ही शुरू हो गया था। बहस कभी अभद्रता में बदली तो दोस्ती की दीवार से कई बेदखल किए गए। जगदीश्वर चतुर्वेदी अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं, ‘संविधान ने वादा किया है कि सत्ता कभी व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेगी। पीएम मोदी ने नोटबंदी के जरिए व्यक्ति के जीवन में हस्तक्षेप करके संविधान की प्रतिज्ञा की अवहेलना की है, संविधान का उल्लंघन किया है’।

फैसले के पक्ष में अपने तर्कों को रखते हुए पंकज कुमार झा अपनी पोस्ट में लिखते हैं, ‘इतिहास में ऐसे अनेक फैसले हुए हैं जिसके परिणाम के बारे में सटीक अंदाज फैसला लेने वालों का भी नहीं रहा होगा। नोटबंदी का निर्णय कुछ-कुछ ऐसा ही है। अत्यंत कल्पनाशील व्यक्ति भी अभी इसके परिणाम के बारे में अनुमान नहीं लगा सकता। हालांकि संतोष की बात है कि अधिकांश से ज्यादा फल इसके सकारात्मक रहे हैं’। वहीं डिफॉल्टरों को बैंकों की मिली शह पर व्यंग्य करते हुए मनोज कुमार लिखते हैं, ‘आप जमा करते जाइए लाइन में लगकर, वे निकालेंगे, डकार जाएंगे और फिर निकालेंगे’। विरोध को लेकर भटक रहे विपक्ष पर निशाना साधते हुए सत्य प्रकाश मिश्रा लिखते हैं, ‘गोली देना बंद करो, बेईमान विपक्ष सरकार की नाक में दम करो’। मोदी जी के परिवार त्याग के महिमामंडन करने पर सुधा सिंह लिखती हैं, ‘पुरुष घर छोड़ता है, स्त्री घर से निकाली जाती है!’

वहीं नोटों की बहस के बीच सोशल मीडिया पर छार्इं सोनम गुप्ता को लेकर इशारा करते हुए दिनेश कुमार लिखते हैं, ‘100-500 के नोट बेवफा हैं…’। पुष्यमित्र लिखते हैं, ‘दमन का ऐसा दौर है कि लोगों की जेब में पुतले जलाने लायक पैसे भी नहीं हैं’। सत्येंद्र पीएस लिखते हैं, ‘1975 वाला अनुशासन पर्व था। 2016 वाला ईमानदारी पर्व है’। बैंक की लाइन में प्रधानमंत्री की मां के लगने के बाद अपराजिता शर्मा लिखती हैं, ‘अगर मैं प्रधानमंत्री होती…तो भी मैं अपनी मां की जगह खुद ही लाइन में लग कर पैसे लेती, चाहे उसके लिए मुझे जापान से अहमदाबाद आना पड़ता’। विकास सारथी लिखते हैं कि देश के सभी बैंककर्मियों को संयुक्त रूप से अशोक-चक्र मिलना चाहिए। गुलजार हुसैन कहते हैं, ‘पहले कहा इतने नोट बदलो, फिर कहा उतने बदलो। अब कहा, नहीं इतने ही नोट बदलो। हद है’।

ऋतु कलसी लिखती हैं, ‘सात पीढ़ियां बैठ कर खाएंगे, ऐसा मुंह उठा कर बोलने वाले, दूध की थैली उधार मांग रहे हैं!’ वहीं प्रभात रंजन लिखते हैं, ‘सब नकारात्मक टाइप ही नहीं है। हाथ में दो हजार का नोट आया तो छुट्टे की समस्या भी नहीं आई। अपने किराने वाले ने दूध-ब्रेड के बदले ही छुट्टा दे दिया।’ संतोष सिंह लिखते हैं, ‘आज तुम उनके हाथ पर स्याही लगाओ कल वे तुम्हारे मुंह पर स्याही पोतेंगे।’ हालात पटरी पर वापस आने की ओर उम्मीदजदा सोनाली मिश्र ने ध्यान दिलाया, ‘तीन दिन से सूनी पड़ी चाउमिन की दुकान पे आज खूब भीड़। दो दिन के बाद नए पांच सौ के नोट का इंतजार। और मुस्कान वापसी।’
तरुण कृष्णा लिखते हैं, ‘बीजेपी ने 7000 करोड़ का कारपोरेट लोन ठीक वैसे ही माफ नहीं किया जैसे कपिल सिब्बल की जीरो लॉस थ्योरी के हिसाब से कांग्रेस ने कोई 2जी घोटाला नहीं किया था’।

नरेंद्र सांवरिया लिखते हैं, ‘चिल्लर वाली गुल्लक में जमा है देश का कालाधन, विदेशी बैंकों में नहीं’। नोट संकट के बाद बच्चों के टूटे गुल्लकों की दास्तां लिखते हुए बोधिसत्व लिखते हैं, ‘हजार और पांच सौ के बड़े नोट हैं बेटी के गुल्लकों के हत्यारे। प्लास्टिक और लोहे के गुल्लक तो खोल लिए लेकिन मिट्टी के गुल्लक तोड़ने पड़े’। वहीं शुक्रवार को छुट्टा दे दे रे मोदी ट्रेंड करता रहा। नोफल बशीर ने ट्वीट किया, ‘गलती हो गई, अब 15 लाख नहीं मांगेंगे, मगर छुट्टा तो दे दे’। असद शेख कहते हैं, ‘मैं पैसे निकालने लाइन में लगा हूं, अब ये ‘देशहित’ में है या नहीं’।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 19, 2016 12:20 am

सबरंग