December 09, 2016

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कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद बोले, तीन तलाक के पीछे कोई गुप्त एजेंडा नहीं

तीन तलाक के मुद्दे पर पूछे गए सवालों के जवाब में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि खास धर्म से होने के कारण महिलाओं का एक समूह अपना अधिकार नहीं गंवा सकता।

Author नई दिल्ली | October 20, 2016 20:13 pm
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद। (फाइल फोटो)

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गुरुवार (20 अक्टूबर) को कहा कि मुस्लिमों में तीन तलाक के विरोध के पीछे या समान नागरिक संहिता लागू करने का सरकार का कोई ‘गुप्त एजेंडा नहीं’ है। इसके साथ ही उन्होंने धार्मिक संगठनों और विपक्षी दलों के आरोपों को निराधार बताते हुए उन्हें खारिज कर दिया। उन्होंने जोर दिया कि भारत धर्म तथा पंथ की स्वतंत्रता का सम्मान करता है लेकिन इससे जुड़े ‘अनुचित या भेदभावपूर्ण’ प्रथाएं इससे जुड़ी नहीं रह सकतीं और न उनकी रक्षा की जानी चाहिए। प्रसाद ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘यह आशंका कि हम समान नागरिक संहिता ला रहे हैं या कोई एजेंडा है, पूरी तरह से निराधार है। दोनों को आपस में जोड़े जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। विधि आयोग इस पर गौर कर रहा है और सभी पक्षों द्वारा व्यापक विचार विमर्श संभव होने दें।’ उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता का विरोध करने वाले लोगों को यह विधि आयोग को बताना चाहिए जिसने इस मुद्दे पर लोगों से राय मांगी है।

प्रसाद ने कहा, ‘अपना विरोध भी बताइए। लेकिन अभी सरकार को कुछ नहीं कहना है। विधि आयोग को गौर करने दें। कोई गुप्त एजेंडा की पूरी चर्चा ऐसी है जिसका मैं अपने पूरे अधिकार से इंकार करता हूं।’ प्रसाद ने ‘छुआछूत’ के चलन का जिक्र करते हुए जोर दिया कि धार्मिक चलनों के संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर दिया कि ‘लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और लैंगिक गरिमा’ नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता के मूल में हैं। उन्होंने कहा, ‘…हम धर्म की स्वतंत्रता और पंथ की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं जिनकी मौलिक अधिकारों के द्वारा रक्षा होती है। लेकिन हर अनुचित या भेदभावपूर्ण प्रथाएं पंथ के साथ जुड़ी नहीं रह सकतीं…।’ उन्होंने कहा, ‘उदाहरण के लिए, क्या कोई यह दावा कर सकता है कि दलितों के खिलाफ छुआछूत मेरे पंथ से आता है और मैं इसका पालन कर सकता हूं। इसलिए धार्मिक प्रथाओं को भी संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।’

तीन तलाक के मुद्दे पर पूछे गए सवालों के जवाब में वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा कि खास धर्म से होने के कारण महिलाओं का एक समूह अपना अधिकार नहीं गंवा सकता। उन्होंने सवाल किया, ‘क्या भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में महिलाओं के एक बड़े हिस्से को सिर्फ इस आधार पर संवेदनशील स्थिति में रहने के लिए बाध्य कर दिया जाए कि वह एक खास धर्म से हैं।’ प्रसाद ने कहा कि संविधान लागू होने के दिन से ही लैंगिक समानता निहित है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की अधिकारिता तथा विकास सरकार की प्राथमिकताओं में हैं। प्रसाद ने कहा कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम काफी बड़ा आंदोलन बन गया है और भू्रण हत्या के खिलाफ मोदी सरकार का अभियान दर्शाता है कि सरकार लैंगिक समानता को गंभीरता से लेती है।

उन्होंने कहा, ‘आप विजयादशमी के दिन (लखनऊ में) उनके प्रसिद्ध बयान को याद कीजिए कि एक सीता के लिए लंका जल गयी और आप हर दिन गर्भ में एक सीता को मारते हैं… मुद्रा योजना में, 70 प्रतिशत लाभार्थीं महिलाएं हैं। डाक विभाग की सुकन्या समृद्धि योजना एक करोड़ को पार कर गयी है…क्रांतिकारी।’ कानून मंत्री ने कहा कि कुछ लोग कह रहे हैं कि तीन तलाक के चलन की समाप्ति शरिया या पर्सनल लॉ का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि उनकी आशंकाओं के जवाब में हमले यह मुद्दा उठाया है जो हमारे हलफनामा में भी दर्ज है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम देशों में तीन तलाक का विनियमन किया है। उन लोगों ने पहले चरण के रूप में सुलह, मध्यस्थता और समझौता का प्रावधान किया है।

ईरान, मोरक्को, मिस्र, ट्यूनिशिया, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान सहित कई देशों ने कानून बनाकर इस प्रथा को समाप्त कर दिया है। उन्होंने कहा, ‘मैं सीधा सवाल कर रहा हूं कि अगर घोषित इस्लामी या मुस्लिम बहुल देशों ने तीन तलाक का विनियमन किया है जिसे पर्सनल लॉ या शरिया के खिलाफ नहीं पाया गया। भारत जैसे घोषित धर्मनिरपेक्ष देश में वही तर्क कैसे प्रासंगिक हो सकता है।’ मंत्री ने कहा कि अनुच्छेद 44 जिसमें समान संहिता की बात की गयी है, उसे संविधान सभा द्वारा संविधान का हिस्सा बनाया गया और संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, बी आर अंबेडकर, मौलाना आजाद और कई अन्य गणमान्य लोग शामिल थे।

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First Published on October 20, 2016 8:13 pm

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