December 06, 2016

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दिल्ली: प्रदेश अध्यक्ष का फैसला सही साबित करने की चुनौती

दिल्ली में सालों से कांग्रेस और भाजपा में सीधे मुकाबले में जब गैर भाजपा मत बंटते हैं तब भाजपा को जीत हासिल होती है।

Author नई दिल्ली | December 1, 2016 03:50 am
मनोज तिवारी

भाजपा नेतृत्व के साथ-साथ दिल्ली भाजपा के नए अध्यक्ष मनोज तिवारी के सामने फैसले को सही साबित करने की चुनौती है। यह खतरा ज्यादा है कि कहीं फरवरी 2015 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित की गर्इं किरण बेदी जैसा हाल मनोज तिवारी का न हो जाए। दस साल से नगर निगमों के सत्ता में काबिज भाजपा को महज चार महीने बाद होने वाले निगम चुनावों में जिताने की तिवारी के सामने बड़ी चुनौती होगी।  दिल्ली के राजनीतिक हालात जिस तरह से हर रोज बदल रहे हैं उसमें विधानसभा के कई सीटों या पूरी विधानसभा के मध्यावधि चुनाव होने की संभावना से कोई इनकार नहीं कर सकता है। दिल्ली के सत्ता में काबिज आम आदमी पार्टी (आप) के संसदीय सचिव बनाए गए 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होने की आशंका के बाद रोगी कल्याण समिति के अध्यक्ष बनाए गए विधायकों की सदस्यता पर भी तलवार लटकी हुई है। मई में निगम सीटों के महज 13 सीटों के उपचुनाव ने दिल्ली की राजनीति में भूचाल ला दिया। उसमें आप को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और कांग्रेस की दिल्ली में वापसी होती दिखी। भाजपा के वोट 34 फीसद पर ही अटक गए। यह तय सा है कि या तो भाजपा विरोधी मतों का आप और कांग्रेस आदि दलों में बंटवारा हो या भाजपा के वोट में बढ़ोतरी हो, इसके बिना भाजपा दिल्ली में सत्ता में नहीं आ सकती है।

दिल्ली में सालों से कांग्रेस और भाजपा में सीधे मुकाबले में जब गैर भाजपा मत बंटते हैं तब भाजपा को जीत हासिल होती है। सीधे मुकाबले में पहले कांग्रेस जीतती रही है। 2013 में राजनीतिक दल बनी आप ने उस साल हुए चुनाव में कांग्रेस में ज्यादा और भाजपा के वोट में ज्यादा सेंध लगाकर 70 सदस्यों वाली विधान सभा में 28 सीटें जीत ली। बिना मांगे कांग्रेस के समर्थन से 49 दिनों की सरकार चलाई और नियमों के खिलाफ जनलोकपाल विधेयक न पेश करने देने पर सरकार से इस्तीफा दे दिया। फिर सबसे बड़ी पार्टी भाजपा साल भर तक तय ही नहीं कर पाई कि कांग्रेस के बागी विधायकों के साथ सरकार बनाए या चुनाव करवाए। जब चुनाव करवाया तब पहले कहा कि किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाएंगे। प्रधानमंत्री की रैली फेल होने पर आनन-फानन में पूर्व आइपीएस अधिकारी किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया। आप 67 के प्रचंड बहुमत से चुनाव जीती। कांग्रेस का खाता नहीं खुला और भाजपा को तीन सीटें मिलीं। खुद किरण बेदी अपना चुनाव नहीं जीत पार्इं।

यह किसी की समझ में ही नहीं आया कि जिन डॉक्टर हर्षवर्धन को सब कुछ अनुकूल रहने के बावजूद 2008 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया गया और आखिरी समय में विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना कर जीती हुई बाजी पलट दी और कांग्रेसी शीला दीक्षित तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गर्इं, उन्हीं हर्षवर्धन को 2013 के विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। तब भाजपा को 32 सीटें मिलीं। हर्षवर्धन को अचानक 2014 के लोक सभा चुनाव में चांदनी चौक से उम्मीदवार बना दिया गया और दिल्ली भाजपा का फिर से अध्यक्ष बनाया गया। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष रहे विजय गोयल को राजस्थान से राज्यसभा में लाकर उनकी नाराजगी दूर की गई। हर्षवर्धन केंद्र में मंत्री बने और 2015 के विधान सभा चुनाव में उन्हें बुरी तरह से दरकिनार किया गया। दो महीने बाद हर्षवर्धन के स्थान पर निगम पार्षद रहे सतीश उपाध्याय को प्रदेश भाजपा की बागडोर सौंपी गई। बताते हैं कि केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की मदद से प्रदेश अध्यक्ष बने उपाध्याय के साथ भी पूर्वी उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि जुड़ी हुई थी।

उनके अध्यक्ष बनते ही उनके हटाए जाने की चर्चा शुरू हो गई। मार्च 2015 में तो राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में एक तरह से अध्यक्ष अमित शाह ने इसकी घोषणा कर दी थी। तब से उपाध्याय की गतिविधियां और कम हो गर्इं। वे पहले भी कम सक्रिय रहे बाद में तो बयानों तक ज्यादा सक्रियता रही। दिल्ली में भाजपा को सालों से 36-37 फीसद वोट मिलता रहा है। इतने वोट लाकर भी भाजपा कांग्रेस समेत कई दलों में गैर भाजपा वोटों के बंटवारा के कारण दो बार से निगम चुनाव जीतती रही है। इतना ही नहीं, 1993 में जब दिल्ली विधानसभा में वे जीतीं तब भी उसे 43 फीसद वोट ही मिल पाए थे। तब जनता दल को मुसलमानों ने एकतरफा वोट दिया था। यह मान लिया गया है कि पंजाब मूल के लोग, वैश्य, सरकारी कर्मचारी, मध्यम वर्ग और ऊंची जाति के लोग भाजपा के तो गरीब, अल्पसंख्यत, गांव, गरीब, पूर्वांचल के प्रवासी, झुग्गी बस्ती और अनधिकृत कालोनियों के लोग कांग्रेस के समर्थक हैं। इन्हीं के बूते कांग्रेस लगातार तीन बार दिल्ली विधान सभा चुनाव जीत पाई। अब वे ही वोटर अरविंद केजरीवाल की आप के साथ हो गए तो उन्हें सत्ता मिल गई।

जाहिर है, पूरबियों में मनोज तिवारी का खूब असर है और लोक सभा में उनकी जीत का एक कारण यह भी था। लेकिन पहली बात तो यही है कि उन्हें संगठन का कोई अनुभव नहीं है। बताया यह भी जा रहा है कि प्राथमिकता न बदलने के कारण ही उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने की घोषणा होने में देरी हुई अन्यथा उन्हें तो पिछले साल ही दिल्ली का अध्यक्ष बनाने की घोषणा होने की बात कही जा रही थी। यह देखना होगा कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उनकी प्राथमिकता क्या दिखती है। चार महीने बाद नगर निगमों के चुनाव हैं और संभव है कि विधानसभा के भी चुनाव हो जाएं। दिल्ली की राजनीति का वैसे तो असर देश भर में होता है लेकिन पंजाब सबसे ज्यादा दिल्ली से प्रभावित है जहां दिल्ली के बाद आप पूरी ताकत से चुनाव लड़ रही है। ऐसे में मनोज तिवारी के लिए प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

 

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First Published on December 1, 2016 3:50 am

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