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Delhi Univercity: छंटनी की आशंका से खौफ में डीयू के शिक्षक

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक सर्कुलर ने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बीच हड़कंप मचा दिया है। दरअसल आयोग की इस नई अधिसूचना ने विश्वविद्यालय के स्थायी शिक्षकों के काम के घंटे बढ़ा दिए हैं।
Author नई दिल्ली | May 20, 2016 01:58 am
दिल्ली विश्वविद्यालय

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक सर्कुलर ने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बीच हड़कंप मचा दिया है। दरअसल आयोग की इस नई अधिसूचना ने विश्वविद्यालय के स्थायी शिक्षकों के काम के घंटे बढ़ा दिए हैं। इसके अलावा अब शिक्षकों को अपनी प्रोन्नति के लिए अपने लेख-शोध आदि प्रकाशित कराना उन जर्नलों में अनिवार्य हो जाएगा जिन जर्नलों और प्रकाशकों की सूची यूजीसी तय करेगा। पहले ऐसी बाध्यता नहीं थी। इतना ही नहीं नए प्रावधान में छात्रों का फीडबैक शिक्षकों की प्रोन्नति के लिए अनिवार्य बना दिया गया है।

बहरहाल डीयू के शिक्षकों के संगठन (डूटा) का दावा है कि हाल ही में जारी यूजीसी का राजपत्र अधिसूचना ‘यूजीसी रेगुलेशन (तीसरा संशोधन)2016’ एक प्रतिगामी कदम है और यह कैंपस में शिक्षण व अध्यापन के लिए भारी विपदा लाने वाला है। इस पर चर्चा के लिए डूटा ने शनिवार को आपात बैठक बुलाई है। डीयू शिक्षकों के तमाम गुट, शिक्षक नेता, विद्वत परिषद् के सदस्य तक इस अधिसूचना का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उन्होंने इसे अस्थायी व अतिथि शिक्षकों को बेरोजगार करने वाला सर्कुलर बता ‘अमानवीय अधिसूचना’ करार दिया। जमीनी हकीकत यह है कि इससे जहां स्थायी शिक्षक काम के अतिरिक्त दबाव से चिंतित हैं वहीं अस्थायी शिक्षक (एडहॉक) छंटनी के खतरे की आशंका से हताश हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की अध्यक्ष डॉक्टर नंदिता नारायण ने इसे ‘अमानवीय अधिसूचना’ बताते हुए जनसत्ता से कहा कि इससे पूरा कैंपस प्रभावित होगा। औसत रूप से एक शिक्षक को 10 से 12 घंटे अतिरिक्त कार्य करना पड़ेगा। इससे अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा व शोध गतिविधियां प्रभावित होने का खतरा बढ़ेगा। उन्होंने कहा, ‘यह अस्थायी शिक्षकों की बड़े पैमाने पर छटनी का छुपा एजंडा है’।
डूटा के पूर्व अध्यक्ष आदित्य नारायण मिश्र ने ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देने वाली केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। खासकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अनुरोध किया है कि इस अधिसूचना को तत्काल वापस कराए। नहीं तो अखिल भारतीय स्तर पर इसके खिलाफ आंदोलन भड़केगा, लोग सड़कों पर उतरेंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्वत परिषद् के सदस्य प्रो हंसराज सुमन ने कहा कि इसके अनुसार असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए हफ्ते में अब 12 की जगह 18 कक्षाएं लेनी होंगी। जबकि एसोसिएट प्रोफेसर के लिए अब 10 की जगह 16 कक्षाएं लेनी होंगी। इसके अलावा दोनों को 6 ट्यूटोरियल भी लेना होगा। इस तरह पहले जहां 144 कक्षाओं के लिए 12 शिक्षकों की जरूरत पड़ती थी। वहीं अब इतनी कक्षाओं के लिए केवल 8 शिक्षकों की जरूरत पड़ेगी। यानी अभी कार्यरत स्थायी और अस्थायी शिक्षकों की कुल संख्या में से एक तिहाई शिक्षक अतिरिक्त होंगे। कई कालेजों में तो इस स्थिति में स्थायी शिक्षक ही अतिरिक्त हो जाएंगे! जबकि डीयू में हजारों लोग कई कई सालों से इस उम्मीद में एडहॉक के रूप में पढ़ा रहे थे कि एक दिन वे स्थायी हो जाएंगे। वे इस सरकारी फरमान से चिंतित हैं। क्योंकि उनके लिए कॅरियर का कोई विकल्प अब नहीं बचा है। ज्यादातर सेवाओं की तय आयुसीमा को वे पार कर चुके हैं। वे विकल्प विहिन हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे अवसाद ग्रस्त नहीं हो सकते।

प्रो हंसराज सुमन ने कहा कि इस अधिसूचना में भीषण अंतर्विरोध भी है। एक तरफ सत्यनारायण जटिया की अध्यक्षता में गठित मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में विश्वविद्यालयों में हजारों पद रिक्त बताकर उन्हें भरे जाने का सुझाव दिया है। वहीं दूसरी ओर यूजीसी ऐसी व्यवस्था देता है जिससे हजारों पद अपने आप खत्म हो जाएंगे। इस अधिसूचना के बाद विश्वविद्यालयके तमाम एडहॉक और अतिथि शिक्षक खुद को ठगा हुआ महसूस करने पर मजबूर हैं। यह अधिसूचना सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के हितों के भी खिलाफ है।

पूर्व डूटा सचिव व पूर्व विधायक डॉक्टर हरीश खन्ना ने कहा कि छात्रों के फीडबैक को प्रोन्नति के लिए अनिवार्य बनाने से विरोधाभासी हालात पैदा होंगे। जबकि एएडी के राजेश झा ने कहा कि इसमें विज्ञान विषयों के लिए 2 घंटे की प्रैक्टिकल को 1 घंटे के व्याख्यान के समतुल्य कर दिया गया है। यह कौशल के युग और मेक इन इंडिया के युग में प्रैक्टिकल के महत्त्व को कम करने वाला कदम है।

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