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जेएनयू छात्रसंघ चुनाव : छात्र टटोल रहे उम्मीदवारों का मिजाज

जेएनयू परिसर में नौ फरवरी की घटना के बाद मचे हंगामे के मद्देनजर सबसे बड़ा मुद्दा तो राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह ही है।
बिरसा अंबेडकर फुले स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन(बाप्‍सा) की बैठक के दौरान मौजूद छात्र। (Express Photo: Oinam Anand)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) धीरे-धीरे चुनावी रंग में रंगने लगा है। दिल्ली विश्वविद्यालय व जेएनयू दोनों के छात्र संघ चुनाव लिंग्दोह समिति के निर्धारित मापदंड के हिसाब से होने हैं, लेकिन जहां दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर उम्मीदवारों के पोस्टर बैनर से अटा पड़ा है, वहीं जेएनयू में इसके लिए जगह तय की गई है कि अमुक दीवार या अमुक नोटिस बोर्ड पर ही पोस्टर लगाए जाएंगे। सेंट्रल लाइब्रेरी के पास ही एक तय जगह पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने का काम चल रहा है। चुनावी परचे बांट रहे एनएसयूआइ के सज्जाद पूरे जोश से कहते हैं कि हमारी जीत तय है। हालांकि उन्हें भी पता है कि इस बार मुख्य मुकाबला वाम गठबंधन और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बीच है।

छात्रों का कहना है कि एबीवीपी का प्रचार कहां-कहां और कैसे हो रहा है इसके बारे में छात्रों के पास मैसेज आ रहे हैं। खास बात यह है कि ये मैसेज उन नंबरों पर आ रहे हैं जो छात्रों ने अकादमिक रिकार्ड में दर्ज करा रखे हैं। अंग्रेजी में एमफिल की छात्रा आस्था दत्ता ने बताया कि उसने अपने घर वालों के नंबर रिकार्ड में दिए थे। उनके पास एबीवीपी के आठ मैसेज आए हैं। अवंतिका दास नाम की एक छात्रा ने भी ऐसे ही मैसेज मिलने की जानकारी दी। लिहाजा वाम संगठनों ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की है। शिकायत में कहा गया है कि या तो प्रशासन एबीवीपी को छात्रों के नंबर व डाटा मुहैया करा रहा है या यह जानकारी कहीं से लीक हो रही है। आरोप यह भी है कि ये मैसेज लिंग्दोह समिति की सिफारिशों के खिलाफ हैं क्योंकि समिति की सिफारिशें के वल पांच हजार रुपए खर्च करने की अनुमति देती हैं। चुनाव समिति का कहना है कि वह संबंधित संगठनों से इस बाबत जवाब मांगेगी।
जेएनयू परिसर में नौ फरवरी क ी घटना के बाद मचे हंगामे के मद्देनजर सबसे बड़ा मुद्दा तो राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह ही है।

इसके साथ ही यहां की फिजाओं में जो मुद्दे तैर रहे हैं और जिन पर जहां-तहां बहस सुनने को मिल रही है उनमें रोहित वेमुला का मामला भी शामिल है। इसके अलावा एक शोध छात्रा के बलात्कार का मसला भी उठाया जा रहा है। एबीवीपी जहां इसे प्रमुखता से उछाल रही है वहीं आइसा एसएफआइ गठबंधन जेएनयू की अस्मिता पर सवाल खड़ा कर रहा है। वह प्रशासन के उस सर्कुलर को भी छात्रों के बीच ले जा रहा है जिसमें कहा गया है कि सामान्य दिनों में कोई भी परिचर्चा करने से पांच दिन पहले प्रशासन से मंजूरी लेना जरूरी है। एसएफआइ की एक नेता ने कहा कि इसमें यह भी कहा गया है कि चर्चा का विषय व कंटेंट भी दिखाने होंगे। सुरक्षा एजंसियां उसकी रिकार्डिंग भी कर सकती हैं। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताकर एबीवीपी के खिलाफ वोट करने की अपील की जा रही है। जेएनयू परिसर में पुलिस के प्रवेश को भी मुद्दा बनाया जा रहा है। इसके अलावा छात्र संगठन बिरसा अंबेडकर संगठन (बाप्सा) भी यहां सक्रिय है।

चीनी भाषा में बीए प्रथम वर्ष के छात्र दुष्यंत का कहना है कि उन्होंने अभी तय नहीं किया है कि वोट किसे देंगे। उनका कहना है कि यहां छात्रावासों की भारी कमी है। एक बेड वाले रूम में भी दो या उससे ज्यादा छात्र रह रहे हैं। वहीं एमफिल (राजनीति विज्ञान) की छात्रा गीता का कहना है कि वह समझ नहीं पा रही हैैं कि किसे वोट करें। वे परिषद के लिंगभेद संबंधी नजरिए को सही से समझ कर ही वोट के बारे में फैसला करना चाह रही हैं।

 

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