December 08, 2016

ताज़ा खबर

 

दिल्ली मेरी दिल्ली: अपने हुए पराए

राजधानी में अगले साल की शुरुआत में तीनों नगर निगमों के चुनाव होने हैं।

Author October 24, 2016 02:44 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो पीटीआई)

नाम के मंत्री

दिल्ली के कानून में मुख्यमंत्री सहित सात मंत्रियों का प्रावधान है। एक तरफ अरविंद केजरीवाल की सरकार अपने विधायकों को रेवड़ियां बांटने के लिए नियमों से परे जाकर 21 को संसदीय सचिव और 27 को रोगी कल्याण समिति का प्रमुख बनाकर उनकी सदस्यता को खतरे में डाले हुए है, दूसरी ओर करीब दो महीने पहले सेक्स सीडी कांड में फंसने के बाद हटाए गए मंत्री संदीप कुमार की जगह पर किसी को भी मंत्री नहीं बनाया गया है। केजरीवाल ने मुख्यमंत्री रहते हुए कोई विभाग न लेकर एक नई परंपरा शुरू की है। वहीं बीमारी के कारण गोपाल राय से उनका सबसे प्रमुख विभाग (परिवहन) ले लिया गया है। युवा मंत्री कपिल मिश्र के पास भी गिनती के विभाग हैं, यही हाल असीम अहमद खान को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाने के बाद मंत्री बनाए गए इमरान हुसैन का भी है। यानी ज्यादातर विभाग दो मंत्रियों- सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया के पास ही हैं। ऐसे में दिल्ली का बुरा हाल होना तो लाजमी है।

परिसीमन का गणित

राजधानी में अगले साल की शुरुआत में तीनों नगर निगमों के चुनाव होने हैं। एक से तीन निगम बनने और सीटों की संख्या 272 के बजाए 138 रहने तक बाहर के किसी आदमी को यह नहीं लग सकता था कि दिल्ली में केंद्र्र सरकार के बाद दिल्ली सरकार से ज्यादा ताकतवर संस्था नगर निगम है। बंटवारे के बाद भी निगमों के अधिकार कम नहीं हुए हैं। दिल्ली पर राज कर रही केजरीवाल सरकार को इसका अहसास निगमों की 13 सीटों के मई में हुए उपचुनाव में हुआ और उसके बाद आप ने अपना सारा फोरस परिसीमन पर कर दिया। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली चुनाव आयोग को दो-दो ड्राफ्ट बनाने पड़े, लेकिन उतने से भी काम नहीं बना तो तीसरे ड्राफ्ट की तैयारी शुरू हो गई। पता नहीं कि उसके बाद सीटों का स्वरूप क्या रहे, लेकिन इससे आप के नेताओं की दिल्ली के बारे में समझदारी तो बढ़ती दिख रही है।

अपने हुए पराए

जेएनयू में आंदोलनों का सिलसिला खासा पुराना है। आंदोलनों के समय छात्र एकजुट नजर भी आते हैं, लेकिन आंदोलन के बाद जब उस आंदोलन की प्रकृति को लेकर बहस छिड़ती है तो कुछ संगठन दामन बचाने की जुगत भिड़ाने में लग जाते हैं। कन्हैया प्रकरण में भी यह देखने को मिला और बीते दिनों लापता हुए छात्र नजीब अहमद के लिए चल रहे आंदोलन में भी। जेएनयू छात्रसंघ के सहयोगी रहे एक वाम धड़े ने कन्हैया प्रकरण में नारेबाजी से असहमति जताते हुए खुद को अलग कर लिया था। हालाकि बाकी मुद्दों पर वह साथ था। इस बार भी वाम के उसी धड़े ने साथ छोड़ दिया। चर्चा है कि शायद इसी वजह से गृह मंत्रालय पर हुआ प्रदर्शन सफल नहीं हो सका।
ये कहां आ गए हम..

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो दिल्ली के बाहर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में लगे हैं, लेकिन उन विधायकों का क्या जो केजरीवाल के नाम और भरोसे पर चुन कर दिल्ली विधानसभा में आए थे। इनमें से कई विधायक जो चुनाव आयोग के शिकंजे में फंसे हैं, वे ठगे से महसूस कर रहे हैं। संसदीय सचिव बनाए गए 21 विधायकों की तो सांस अटकी है कि कहीं दिवाली के तोहफे के रूप में उन्हें विधानसभा की सदस्यता रद्द किए जाने का फैसला ना सुनना पड़े। इन विधायकों से बातचीत में खोखली हंसी और हार साफ झलकने लगी है, हालांकि वो अरविंद केजरीवाल के खिलाफ खुल कर अभी कुछ नहीं बोल रहे, लेकिन एक सवाल उनकी आंखों में दिखाई पड़ता है, ‘ये कहां आ गए हम?’
-बेदिल

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 24, 2016 2:39 am

सबरंग