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दिल्ली मेरी दिल्ली- आफत बने उम्मीदवार

अंग्रेजों ने जब लिखा कि ‘डॉग एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड’ तो गांधी खड़े हुए थे, लेकिन जब डीएमआरसी के एक खास कर्यक्रम में ‘नॉन एग्जीक्यूटिव एंप्लाइज आर नॉट अलाउड’ लिख कर कर्मचारियों को उनके अपने समारोह मे जाने से रोका गया तो कोई वहां कोई गांधी नहीं खड़ा हुआ।
Author August 14, 2017 04:41 am
महात्मा गांधी (File Photo)

आफत बने उम्मीदवार
बवाना विधानसभा सीट पर 23 अगस्त को होने वाले उपचुनाव में ताल ठोकने को तैयार तीनों प्रमुख दल अपने-अपने उम्मीदवारों से परेशान हैं। बसपा का साथ छोड़कर ‘आप’ के उम्मीदवार बने रामचंद्र के बदले जाने की अफवाह कई दिनों से चल रही है। मुमकिन है कि यह विरोधी दलों की साजिश हो, लेकिन जिस तरह से आप का प्रचार रफ्तार नहीं पकड़ रहा है, उससे पार्टी के रणनीतिकारों की परेशानी बढ़ रही है। वहीं भाजपा ने आप के विधायक रहे वेद प्रकाश को टिकट दिया है। उनको टिकट दिए जाने के विरोध में भाजपा के विधायक रहे गुग्गन सिंह आप के खेमे में चले गए। कई और नेता भी भाजपा छोड़ चुके हैं। कहा जा रहा है कि न तो भाजपा का प्रदेश नेतृत्व और न ही स्थानीय नेता वेद प्रकाश से खुश हैं, लेकिन अमित शाह के डर से सभी चुपचाप चुनाव प्रचार में लगे हैं। वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार सुरेंद्र कुमार का राजनीतिक कद पार्टी के कई नेताओं से इतना ऊपर हो गया है कि वे आम उम्मीदवार की तरह बर्ताव ही नहीं कर रहे हैं। ऐसे में बवाना सीट किसकी झोली में गिरेगी यह देखना दिलचस्प होगा।

कटआॅफ की बारिश
दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस बार दाखिले के लिए पांच कटआॅफ का एलान कर दस कटआॅफ जारी कर दी। गनीमत यह रही कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने इसे आखिरी बता दिया। हालांकि इस पर भी किसी को भरोसा नहीं है, खासकर दाखिले में लगे कर्मचारियों को। कैंपस के गलियारे में चर्चा है कि जब तक पहला सेमेस्टर बीत न जाए तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता। हो सकता है कि ‘विशेष ड्राइव’ के नाम से एक बार फिर दाखिले का मौका दे दिया जाए। बहरहाल जो भी हो। कॉलेज न तो कटआॅफ कम करने का नाम ले रहे हैं और और न ही बची हुई सीटें भरने का।

मेहमान बने मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सरकार बनने के वक्त से ही विधानसभा की बैठक में मेहमानों की तरह आते रहे हैं जबकि गिनती के कुछ दिनों के लिए होने वाली विधानसभा की बैठकें तभी बुलाई जाती हैं जब मुख्यमंत्री उसमें शामिल होने की पूरी तैयारी कर लेते हैं। पहले तो कहा जाता था कि केजरीवाल देशभर में अपनी पार्टी के प्रचार में व्यस्त रहते हैं इसलिए वे बैठक में नहीं आ पाते, लेकिन पंजाब विधानसभा चुनाव हारने के बाद तो उनका राष्ट्रीय पार्टी बनाने का अभियान फिलहाल ठंडा पड़ गया है। पर अब तो दिल्ली में रहते हुए भी वे विधानसभा की बैठक को गंभीरता से नहीं लेते और गाहे-बगाहे ही इसमें शामिल होते हैं। किसी भी विभाग की जिम्मेदारी न लेने वाले केजरीवाल पहले भी उन्हीं सरकारी कामों में हाथ डालते थे जिसमें उनका मन होता था। पुराने सहयोगी कपिल मिश्र के भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद तो उनकी बयानबाजी भी रुक सी गई है और सरकारी कामों में सक्रियता भी कम हो गई है। तभी तो विपक्ष के लोग यह सवाल उठाते रहते हैं कि जब इच्छा ही नहीं थी तो मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी क्यों ली।
ट्रैफिक पुलिस की सुस्ती
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस अदालत के निर्देश को जितनी सख्ती से मान रही है उतनी ही सख्ती से अगर वह जनता की सहूलियतों पर भी ध्यान दे तो कितना अच्छा होगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार लाल बत्ती पार करने व ड्राइविंग लाइसेंस के बिना गाड़ी चलाने जैसे अन्य ट्रैफिक नियमों को तोड़ने पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। ट्रैफिक पुलिस इसी निर्देश के तहत ड्राइविंग लाइसेंस जब्त तो करती है, पर तीन महीने के भीतर परिवहन विभाग में उतनी मुस्तैदी से जमा नहीं करा पाती। इसका खमियाजा उन लोगों को उठाना पड़ता है जो लाल बत्ती पार करने के बाद जुर्माना देते हैं और जब्त किए गए लाइसेंस के लिए परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस के दफ्तर के चक्कर काटते रहते हैं।
अफसरों की अंगरेजियत
अंग्रेज चले गए पर आम और खास का भेद देश की अफसरशाही में रोप गए। इसकी गहरी जड़ें अब शाखाओं व पत्तियों तक को इसी भेद-भाव से पाल-पोस रही हैं। इसकी बानगी दिल्ली मेट्रो रेल निगम के अफसरी गलियारे में आए दिन देखने क ो मिलती है। इसी तरह के एक वाकये से रूबरू हुए आम कर्मचारियों ने बताया कि किस तरह से खास ने आम को बाहर का रास्ता दिखाया। अंग्रेजों ने जब लिखा कि ‘डॉग एंड इंडियंस आर नॉट अलाउड’ तो गांधी खड़े हुए थे, लेकिन जब डीएमआरसी के एक खास कर्यक्रम में ‘नॉन एग्जीक्यूटिव एंप्लाइज आर नॉट अलाउड’ लिख कर कर्मचारियों को उनके अपने समारोह मे जाने से रोका गया तो कोई वहां कोई गांधी नहीं खड़ा हुआ। अगर बेचारे कर्मचारी इसके विरोध में बोलते तो उनके पेट पर लात पड़ जाती।
-बेदिल

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