March 27, 2017

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दिल्ली मेरी दिल्ली- नहीं चला मशीन का मुद्दा, खुद ही चोर साबित करने में लगे

उप्र चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने अन्य दलों के नेताओं के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है।

Author March 20, 2017 02:58 am
मनीष सिसोदिया(दाएं) और अरविंद केजरीवाल

नहीं चला मशीन का मुद्दा
विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले ही अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली नगर निगम चुनावों की तैयारी तेज कर दी थी। वे मान कर चल रहे थे कि पंजाब तो जीत ही लेंगे। चुनाव नतीजों से आप नेताओं को सांप सूंघ गया। गोवा में एक भी सीट नहीं मिली और पंजाब वोट के औसत में तीसरे नंबर पर पहुंच गए। अकाली से सीट ज्यादा होने का उत्साह भी जाता रहा। केजरीवाल एक दिन तो चुप रहे। उन्हें बसपा प्रमुख मायावती के वोटिंग मशीन में हेराफेरी के आरोप में दम लगा, वे उसी की जाप करने लगे। दो -तीन दिन में हर स्तर पर सफाई आने के बाद उन्हें जबरन चुप्पी लगानी पड़ी। अब निगम चुनाव और उससे पहले राजौरी गार्डन विधानसभा सीट का उपचुनाव सिर पर है। ऐसे में उनके लिए अगले मुद्दे की तलाश कठिन हो गई है।

खुद ही चोर साबित करने में लगे
दिल्ली की नगर निगमों में पिछले दस साल से सत्ता में बैठी भाजपा के लिए 22 अप्रैल का नगर निगम चुनाव फिर से जीतना बड़ी चुनौती बन गया है। निगमों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने के लिए उन्होंने अपने सभी पार्षदों के टिकट काटने का फरमान जारी कर दिया। अगर वास्तव में ऐसा था तो वे सुधार की बात पहले करते। अब तो उन्होंने सभी पार्षदों का टिकट काटकर एक तरह से खुद कबूल लिया कि उनके सारे ही पार्षद भ्रष्ट थे। इस फैसले के बाद पार्षदों की बगावत और असहयोग से ज्यादा चुनाव प्रचार करना कठिन होगा।

भूदानी झोला
दिल्ली पर राज करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं की अपनी ही शैली है। लोग उनकी आलोचना करते रहें, लेकिन वे प्रयोग करते रहते हैं। आम आदमी बन कर सत्ता में रहने का दावा करने वाले आप के नेताओं ने पहले सरकारी गाड़ी ली, फिर कोठी और फिर सुरक्षा का तामझाम। इतना ही नहीं, आम आदमी के बीच रहने वाले नेताओं की कोठियों और दफ्तरों में आम आदमी का प्रवेश भले ही बंद हो गया हो, लेकिन वे अपना प्रयोग जारी रखे हुए हैं। बजट की प्रति ब्रीफकेस में इसलिए नहीं क्योंकि वित्त मंत्री संसद या विधान सभा में जाते हैं कि उन्हें लोगों को धौंस दिखाना होता है, आखिरी समय तक बजट की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उसे सुरक्षित रखा जाता है। दिल्ली के वित्त मंत्री मनीष सिसोदिया ब्रीफकेस के बजाए भूदानी झोले में बजट की प्रति लेकर विधानसभा गए। लोगों ने उनके प्रयोग को नौटंकी ही ज्यादा माना। यह कौन तय करेगा कि महंगी सैंडिल पहनने से आम आदमी खास बन जाता है या जाड़े से बचाव के लिए सामान्य जूता पहनने से कोई आम से खास बन जाता है।

आस अधूरी
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की टीम को नए उपराज्यपाल अनिल बैजल के आने के बाद लगने लगा था कि वे जो चाहेंगे वह करा लेंगे। नियमों के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और अतिथि शिक्षकों के वेतन बढ़ाने की फाइल को मंजूरी देने से आप नेताओं को यही लगा था। नियमों को दरकिनार करके खुदकुशी करने वाले एक पूर्व सैनिक को एक करोड़ के मुआवजे के ऐलान की मंजूरी उपराज्यपाल ने नहीं दी। अपने अनोखे अंदाज के लिए मशहूर केजरीवाल और उनके लोगों ने एक मिनट भी नहीं लगाया और उपराज्यपाल से लेकर प्रधानमंत्री तक की आलोचना कर डाली। आने वाले दिनों में इस तरह के विवाद बढ़ने के भी संकेत दिखने शुरू हो गए हैं क्योंकि कई मामले पहले से ही केंद्र सरकार के पास लंबित पड़े हैं।

ट्वीट की चहचहाहट भी नहीं
कभी हर मुद्दे पर सोशल मीडिया के माध्यम से टिपण्णी करने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आजकल खामोश हैं। ग्यारह मार्च को पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से आप के राष्ट्रीय संयोजक की माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर केवल इक्के-दुक्के ट्विट्स देखने को मिले हैं, वो भी अपने मुद्दों से जुड़े या शुभकामनाओं वाले। यहां तक कि हमेशा नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ ट्वीटर युद्ध जारी रखने वाले केजरीवाल उत्तर प्रदेश में मोदी-शाह द्वारा योगी की ताजपोशी के फैसले पर भी खामोश रहे। लगता है कि पंजाब और गोवा के नतीजों के बाद केजरीवाल आत्ममंथन में लीन हैं और सबक के तौर पर अब अपना ध्यान दिल्ली सरकार, पार्टी और नगर निगम चुनावों में लगाने की कोशिश कर रहे हैं।

नतीजों की नपाई
उप्र चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने अन्य दलों के नेताओं के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में हारने वाले सपा और बसपा के नेता अब स्थानीय स्तर पर अपने कद को तय करने के लिए बूथवार वोटों की आंकड़ेबाजी में जुट गए हैं। नोएडा विधानसभा सीट पर दूसरे नंबर पर रहे सपा उम्मीदवार सुनील चौधरी के समक्ष अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पसंद पर उम्मीदवार बने सुनील चौधरी अपने निजी बूथ पर ही चुनाव हार गए हैं। सुनील चौधरी के नजदीकी माने जाने वाले पूर्व महानगर अध्यक्ष बीर सिंह यादव भी अपने बूथ में सपा को जिताने में नाकाम रहे हैं। वहीं, सुनील के विरोधी खेमे के माने जाने वाले महानगर अध्यक्ष राकेश यादव, पूर्व महानगर अध्यक्ष सूबे यादव अपने-अपने बूथों पर सपा उम्मीदवार के पक्ष में ज्यादा मतदान कराने में सफल रहे हैं। बताया जा रहा है कि स्थानीय स्तर पर बूथवार आंकड़ों के आधार पर पदाधिकारी अपना कद खुद तय कर रहे हैं। -बेदिल

 

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First Published on March 20, 2017 2:58 am

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