December 07, 2016

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दिल्ली: नोटबंदी से खत्म हुई जनपथ की रौनक

दुकानदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘फैसला अच्छा है, लेकिन लागू करने की प्रक्रिया गलत है, 2000 रुपए की जगह 500 के नोट आने चाहिए थे।

Author नई दिल्ली | November 22, 2016 03:51 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पारंपरिक और गैर-पारंपरिक पोशाकों, सजावटी चीजों और कला व हस्तशिल्प के लिए महशूर दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस के पास स्थित जनपथ बाजार की रौनक नोटबंदी के फैसले के बाद गुम सी हो गई है। बारह दिन गुजर जाने के बावजूद यहां के दुकानदार बोहनी की बाट जोहते सुबह से शाम बिता रहे हैं। बिक्री में 80 से 95 फीसद तक की गिरावट झेल रहे दुकानदारों का कहना है ऐसी मंदी आज तक नहीं देखी और इसे पटरी पर आने में अभी 2 से 3 और महीने लगेंगे। इसके बावजूद जनपथ बाजार के ज्यादातर दुकानदार नोटबंदी के साथ हैं और उन्हें उम्मीद है कि यह फैसला अंतत: गरीबों के हक में जाएगा।  बीते 15 साल से जनपथ में फुटपाथ पर कढ़ाई के कपड़ों की दुकान लगाने वाली सुनीता ने बताया कि सुबह से कोई बोहनी नहीं हुई है, लेकिन इसके बावजूद सुनीता का मानना है कि मुश्किल का सामना नहीं करेंगे तो आगे सुख कैसे मिलेगा। मूलत: गुजरात की रहने वाली सुनीता ने कहा, ‘देश के लिए मोदी का साथ देंगे, यह देश के लिए अच्छा फैसला है, हमारे लिए अच्छा फैसला है।’ सुनीता के साथ ही दुकान लगाने वाली शीतल और भरत का भी यही मानना है। हालांकि भरत ने कहा, ‘पीछे से माल लाने में मुश्किल हो रही है, नकदी ही नहीं है देने को।’

जनपथ बाजार स्थानीय लोगों के अलावा विदेशी सैलानियों के बीच भी खासा मशहूर है बेचने वालों की कमाई में इन सैलानियों का बड़ा योगदान भी है, लेकिन नोटबंदी के फैसले ने सैलानियों के हाथ बांध दिए हैं जिसका असर बाजार में दिख रहा है। घूम-घूम कर बीन बेचने वाले राकेश ने कहा कि शुक्रवार से बोहनी नहीं हुई है। उन्होंने कहा, ‘विदेशी इन चीजों में खासी रुचि लेते हैं, लेकिन इस फैसले से विदेशी ग्राहक खरीददारी कर ही नहीं रहे हैं। किसी दिन जो 100-150 रुपए की कमाई होती है वह आने-जाने में ही खर्च हो जाती है।’ 30 साल से हाथ के बने टेबल क्लॉथ बेच रही शांति ने कहा, ‘हम लोगों के पास तो बैंक खाता ही नहीं है, मेरी बेटी ने आज खाते के लिए आवेदन दिया है। 10-12 दिनों से बोहनी भी नहीं हो रही है, घर चलाना मुश्किल हो गया है, 500 के एक-दो नोट हैं उन्हें बदलवाना भी मुश्किल हो गया है, काम करें या कतार में खड़े हों, लेकिन हमें विश्वास है कि प्रधानमंत्री ने यह फैसला गरीबों के लिए किया है।’ शांति की बेटी ने कहा कि इतने प्रधानमंत्रियों पर भरोसा किया, अब इन पर भी कर रहे हैं, यह फैसला तो हमारे लिए ही है, आज गरीब-अमीर सब एक हो गए हैं, अमीर लोग हमसे खुले मांगते हैं, चिल्लर वाले राजा हो गए हैं।

कृत्रिम और पारंपरिक गहने की दुकान ‘संगम ज्वेलरी’ के मनीष ने बताया, ‘95 फीसद तक बिक्री खत्म हो गई है, यह गलत फैसला है, मीडिया भी वही दिखा रही है, जो मोदी चाह रहे हैं। बोहनी के लाले पड़े हैं, ग्राहक आने बिल्कुल बंद हो गए हैं।’ वहीं पास के अन्य दुकानदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘फैसला अच्छा है, लेकिन लागू करने की प्रक्रिया गलत है, 2000 रुपए की जगह 500 के नोट आने चाहिए थे। निकासी की जो सीमा है, उसमें लोग खाना खाएंगे या खरीदारी करेंगे। ऐसी मंदी आज तक नहीं देखी, भरपाई में 2-3 महीने लगेंगे। अभी डेबिट या क्रेडिट कार्ड मशीन लगवाने में भी मुश्किल है।’ बताते चलें कि जनपथ की आधी से ज्यादा दुकानों में कार्ड से भुगतान की व्यवस्था नहीं है।  दिल्ली सरकार के एक विभाग में नौकरी करने वाले रमेश जनपथ पर पार्ट टाइम हुक्का, लकड़ी के सांप और मंडाला बेचते हैं। रोजाना बीस घंटे काम करने वाले और ईमानदारी के सहारे करोड़पति बनने का सपना देखने वाले रमेश मोदी सरकार के इस फैसले को ईमानदारों और सच्चे लोगों के पक्ष में लिया गया फैसला बताते हैं।

 

 

 

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First Published on November 22, 2016 3:51 am

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