December 08, 2016

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भूखे विदेशी सैलानी पूछते हैं गुरुद्वारे का रास्ता

दिल्ली का दिल कहलाने वाले कनॉट प्लेस ने हर अमीर-गरीब, देशी-विदेशी को जगह दी है। यह वह जगह है जहां रेहड़ी पटरी पर 10-20 रुपए से अपनी पेट पूजा सकते हैं, वहीं थोड़ा और खर्च कर मद्रास कॉफी हाउस जैसे धरोहर वाली जगह पर कॉफी और डोसा का आनंद ले सकते हैं, और अगर पॉकेट खचाखच है तो किसी बड़े होटल में दावत कर सकते हैं।

Author नई दिल्ली | November 25, 2016 04:07 am

दिल्ली का दिल कहलाने वाले कनॉट प्लेस ने हर अमीर-गरीब, देशी-विदेशी को जगह दी है। यह वह जगह है जहां रेहड़ी पटरी पर 10-20 रुपए से अपनी पेट पूजा सकते हैं, वहीं थोड़ा और खर्च कर मद्रास कॉफी हाउस जैसे धरोहर वाली जगह पर कॉफी और डोसा का आनंद ले सकते हैं, और अगर पॉकेट खचाखच है तो किसी बड़े होटल में दावत कर सकते हैं। लेकिन, नोटबंदी से बीच वाला वर्ग बिल्कुल टूट गया है, आजादी के पहले से कनॉट प्लेस में चल रही कई खाने-पीने की छोटी दुकानें आज अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित हैं। देश की अजादी गवाह रहीं ये दुकानें आज भी कार्ड से पेमेंट की व्यवस्था से दूर हैं और नोटबंदी की मार झेल रही हैं।

कनॉट प्लेस के बाहरी सर्किल में चाय-कॉफी, समोसा, बर्गर, की दुकान न्यूलुक रेस्त्रां में 1951 से मैनेजर का काम कर रहे 79 वर्षीय राजेंद्र प्रसाद ने कहा, ‘इससे अच्छी तो इंदिरा गांधी के जमाने की इमरजेंसी थी, हमारे नोट तो नहीं बंद हुए थे, हमारी रोजी तो चल रही थी’। 1947 में खुला यह दुकान देश की आजादी का गवाह है। राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि इस दुकान में उन्हें मिलाकर चार कर्मचारी हैं, लेकिन इस महीने की तनख्वाह अब मुश्किल लग रही है। जहां पहले प्रति दिन 3000-3500 रुपए की बिक्री होती थी, वहीं अब 200-300 रुपए का ही बिक पाता है, कई लोगों को खुले नहीं होने के कारण लौटाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि बिक्री कम होने के कारण हर दिन सामान फेंकना पड़ रहा है, यह परचून की दुकान तो है नहीं कि आज नहीं तो कल बिक जाएगा। राजेंद्र प्रसाद ने आशंका जताई की अगर हालात नहीं सुधरे तो दुकान बंद करने की नौबत आ सकती है।

सीसीडी, मैक्डी, सर्वणा हाउस, पीज्जा हट की चकाचौंध से दूर ब्रिटिश काल की छाया का एहसास दिलाता खामोश सा मद्रास कॉफी हाउस (एमसीएच) वैसे भी ग्राहकों को लुभाने के लिए कभी कोई जतन करता नहीं दिखता, लेकिन नोटबंदी का शिकार यह भी है। 1935 में स्थापित कॉफी हाउस कम दाम में अच्छी कॉफी और साउथ इंडियन व्यंजन के लिए हैंगआउट के शौकीन लोगों के बीच लोकप्रिय है, लेकिन आज यह बिक्री में 80 फीसद की गिरावट झेल रहा है। दुकान में काम करने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि कई लोग 500 रुपए का एक नोट लेकर चाय पीने आते हैं जो हम ले नहीं सकते, तो कई 2000 रुपए का नोट लेकर आते हैं, जिसके खुले नहीं होते, ऐसे में ग्राहकों को लौटाने के सिवा कोई चारा नहीं।

दुकान में डेबिट और क्रेडिट कार्ड से पेमेंट की बात पूछे जाने पर एमसीएच के कर्ता-धर्ता हरकिशन नंदा ने कहा कि हम छोटे व्यापारी हैं, प्रति दिन 5000-6000 की बिक्री करते हैं, ऐसे में कार्ड की मशीन लगाने की हम नहीं सोचते, आगे देखा जाएगा। कॉफी हाउस में ही मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि हम लोगों की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं, कई विदेशी आते हैं, बंद भारतीय करंसी दिखाते हैं, लेकिन हमारे यहां खा नहीं सकते, पूछते हैं गुरुद्वारे का रास्ता बता दो लंगर खा लेंगे, कई हमारे दुकान से भूखे लौट जाते हैं’। यही हाल खाने-पीने की अन्य छोटी दुकानों का है। कनॉट प्लेस के अंदर के सर्किल में अलग-अलग जायके के शेक के लिए मशहूर दुकान का भी यह हाल है। 1947 से चल रहा यह दुकान आज बिक्री की मार झेल रहा है। नकदी में ही कारोबार कर रहे इस दुकान पर कुछ लोग 500-1000 के नोट चलाने की कोशिश करते नजर आए। अर्थ के गणित की समझ रखने वाले ये दुकानदार किसी ‘अच्छे दिन’ के मुगालते से दूर नोटबंदी पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ का कहना है नोटबंदी तो ठीक है पर इसके इंतजाम तो करते, वहीं कुछ का कहना है कि यह कोई सकारात्मक कदम नहीं, केवल नोटबंदी से क्या होगा।

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First Published on November 25, 2016 4:04 am

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