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दिल्ली: अस्पताल के तानाशाही रवैए के खिलाफ15 दिनों से कर्मचारियों धरने पर

र्मचारी अपने कुछ साथियों को बिना जांच किए नौकरी से निकालने के खिलाफ न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
Author नई दिल्ली | June 20, 2017 04:44 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

इंस्टीट्यूट आॅफ लीवर एंड बिलियरी साइंस (आइबीएलएस) में अस्पताल प्रशासन के तानाशाह रवैए के खिलाफ संस्थान के कर्मचारी पिछले 15 दिन से धरना और पांच दिन से अनशन पर हैं पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। दरअसल, ये कर्मचारी अपने कुछ साथियों क ो बिना जांच किए नौकरी से निकालने के खिलाफ न्याय की गुहार लगा रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि अस्पताल में उनके मानवाधिकार का तो हनन हो ही रहा है बुनियादी संवेदना के स्तर पर भी अस्पताल प्रशासन शून्य है। हालांकि अस्पताल के निदेशक डॉ. एसके सरीन का कहना है कि कर्मचारियों की मांगें जायज हैं। एक कर्मचारी के खिलाफ पुलिस में मामला है, उसको छोड़ बाकी सब का समाधान करने की कोशिश जारी है। उम्मीद है जल्दी ही समाधान निकल आएगा।  कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से लेकर पुलिस प्रशासन सभी से गुहार लगा ली लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है। उल्टे अस्पताल प्रशासन ने पुलिस में एक पत्र भेज अपना पल्ला झाड़ लिया है। प्रशासन की ओर से पुलिस को भेजे पत्र में कहा है कि अनशनकारी कर्मचारियों को कुछ होता है तो उस सूरत में अस्पताल प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

यहां के कर्मचारी अनिल लांबा को नौकरी से निकाल दिया गया है। उन पर कई तरह के आरोप लगाते हुए वसंत कुंज थाने में एफआइआर दर्ज करा दी गई। लांबा का कहना है कि अगर हमारे खिलाफ जांच कमेटी बना कर जांच कर ली जाए और अगर हम दोषी हैं तो किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार हैं। कर्मचारियों का कहना है कि अभी तक पुलिस भी कोई आरोप तय नहीं कर पाई है। धरने पर बैठे कर्मचारियों के मुताबिक लांबा का कसूर है कि वे एक अन्य कर्मचारी राकेश कुमार वर्मा का साथ देने खड़े हो गए थे। कर्मचारी वर्मा ने नौकरी के दौरान कई बार परेशान करने व नाहक तनाव देने का आरोप लगाते हुए बेमियादी अनशन पर हैं। वर्मा का आरोप है कि उन्हें पिता के इलाज कराने जाने के लिए छुट्टी नहीं दी गई। किसी तरह अवकाश के दिन देखने गया। लेकिन जब समुचित इलाज के अभाव में राजस्थान में रह रहे उनके पिता ने दम तोड़ दिया तो राकेश काम पर नहीं आ सके। 15 नवंबर को पिता की मौत के बाद वे जब पांच दिसंबर को काम पर लौटे तो सहानुभूति की बजाय उनको नौकरी से निकालने क ी धमकी दी गई और वेतन रोक दिया गया। पिता की मौत की पर्ची दिखाने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई।

तीन साल से ठेके पर काम कर रहे इस कर्मचारी ने कहा कि उसको पहले ही निकाल देने की कोशिश चल रही थी। पिछले साल जब वह दुर्घटना में घायल हुए तो उनसे फिटनेस सर्टिफिकेट मांगा गया। डीडीयू में दिखाने व लिखित में लाने को कहा गया। फिटनेस देने की बजाय डीडीयू ने दो हफ्ते प्लास्टर लगाने की सलाह दी। इसके बाद जब वह 15 दिन बाद सर्टिफिकेट के साथ नौकरी पर गए तो उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। वर्मा ने हार कर अनुसूचित जाति जनजाति कानून के तहत अपने उत्पीड़न क ी शिकायत 17 दिसंबर 2016 को पुलिस में कराई। कई कर्मचारी ने अस्पताल प्रशासन के दबाव में मुकर गए अनिल उसी मामले में मुख्य गवाह हैं और अड़े हुए हैं कि वर्मा को नाहक परेशान किया जा रहा है।

 

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