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दिल्ली: सरकारी स्कूलों में शिक्षक पढ़ाना छोड़ कानून और दफ्तरों में उलझे

अखिल भारतीय अभिभावक संघ (एआइपीए) ने मुख्यमंत्री केजरीवाल को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।
Author October 14, 2016 04:00 am
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दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी के मद्देनजर अभिभावक और शिक्षक संघ ने कानूनी काम और मेंटर टीचर के रूप में लगाए गए टीचरों को वापस स्कूल में तैनात किए जाने की मांग की है। लगभग 50 शिक्षक (प्रिंसिपल, पीजीटी, टीजीटी) कई सालों से कानूनी कामों में संलग्न हैं, 200 शिक्षकों को मेंटर टीचर बनाया गया है, जबकि सरकारी स्कूलों में 80 फीसद प्रिंसिपल के पद खाली हैं और लगभग 20,000 शिक्षकों के पद खाली हैं। अखिल भारतीय अभिभावक संघ (एआइपीए) ने मुख्यमंत्री केजरीवाल को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।

सरकारी स्कूलों में नियमित शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया में कोई तेजी नहीं होने के कारण हजारों विद्यार्थी प्रभावित हो रहे हैं। स्कूलों में गेस्ट टीचर और स्थायी शिक्षकों का सम-विषम कर काम चलाने की कोशिश हो रही है। इस कमी के बावजूद 47 शिक्षकों (25 प्रिंसिपल, 2 पीजीटी और 20 टीजीटी) को कैट (सीएटी), हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में डेप्युटेशन पर तैनात कर कानूनी काम कराए जा रहे हैं। ये लोग वर्षों से शिक्षण कार्यों से दूर हैं। आॅल इंडिया पैरेंट एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक अशोक अग्रवाल के मुताबिक, ‘2 पीजीटी और 20 टीजीटी (एलएलबी पास) शिक्षकों को पिछले तीन सालों से कोर्ट के कामकाज में इस आश्वासन पर संलग्न किया गया कि उनके शैक्षणिक पद को कानून अधिकारी के पद में बदल दिया जाएगा। अब ये ठगे हुए महसूस कर रहे हैं और वापस शिक्षण कार्य में जाना चाहते हैं, लेकिन शिक्षा निदेशालय उन पर कोर्ट वर्क करने का दबाव बनाए हुए है’। अभिभावक संघ के मुताबिक, 25 प्रिंसिपल जो पिछले 15-16 सालों से कानूनी कामों के लिए तैनात किए गए थे उन्हें उप शिक्षा अधिकारी (डीईओ) का पद दिया गया है, जो कि विभाग के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।

राजकीय स्कूल शिक्षक संघ (जीएसटीए) के महासचिव अजयवीर यादव के मुताबिक, कानूनी सहायक और मेंटर टीचर के रूप में तैनात इन शिक्षकों के खाली पदों को गेस्ट टीचरों से भी नहीं भरा जा सकता क्योंकि इनका वेतन स्कूल से बन रहा है। उन्होंने कहा, ‘जीएसटीए शिक्षकों की भारी कमी के कारण लीगल एडवाइजर और मेंटर टीचर ना लगाने की बात को पिछले दो सालों से कहती आ रही है। शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्य में लगाने से बच्चों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है, लेकिन इससे शिक्षा निदेशालय को कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें विभाग के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई से डर लगता है’।
जीएसटीए का कहना है कि शिक्षकों के कानूनी सहायक लगने से गोपनीयता से भ्रष्टाचार करने में बहुत आसानी हो गई है क्योंकि कोर्ट में मामला या तो शिक्षक द्वारा दायर होता है या शिक्षक के खिलाफ विभाग ने डाला होता है, ऐसे में दोनों ही सूरत में टीचर अपने साथी (कानूनी सहायक) को अपने सामने खड़ा पाकर लेने-देने की बात करने पर लाचार नजर आता है।

अजयवीर यादव पूछते हैं, ‘भूमि व भवन’ विभाग में दो प्रिंसिपल व कई टीचर लगे हैं, उनकी निर्माण कार्य में क्या विशेषज्ञता है? डेप्यूटेशन ऐसा सुगम रास्ता है कि टीचर को सीधे स्कूल से दफ्तर में बैठा देता है। इसकी शुरुआत 2002 में डायरेक्टर आॅफिस में विकास कलिया (पीजीटी) की पोस्टिंग से हुई और आज मेंटर टीचर लगने तक चली आ रही है। एक ओर सरकारी स्कूलों में लगभग 34 शिक्षकों की कमी है, वहीं शिक्षा मंत्री की कोर टीम बन मेंटर टीचर एनजीओ के कामों को अंजाम दे रहे हैं, बाकी विद्यालयों के स्थान पर कचहरी को अपनी तकदीर बना चुके हैं।

 

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