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सिर्फ पीएचडी तक सिमटा गांधी दर्शन…

गांधी जयंती के दो दिन पहले दिल्ली के राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय व पुस्तकालय में सन्नाटा पसरा था। बाहर चौकीदार के अलावा भीतर संग्रहालय में कोई नजर नहीं आया।
Author नई दिल्ली | October 2, 2016 05:20 am
रााष्ट्रपिता महात्मा गांधी

सुमन केशव सिंह

गांधी जयंती के दो दिन पहले दिल्ली के राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय व पुस्तकालय में सन्नाटा पसरा था। बाहर चौकीदार के अलावा भीतर संग्रहालय में कोई नजर नहीं आया। न मेहमान और न ही मेजबान। अंदर आॅडिया-वीडियो कक्ष में एयरकंडीशन से लेकर पंखे और ट्यूब लाइट तक जल रहे थे। गांधी पर वृत्त चित्र चल रहा था लेकिन कमरा खाली था। काफी देर संग्रहालय देखने और फिर फोटो गैलरी में समय बिताने के बाद नजर आए लोगों ने बताया कि लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन एसके भटनागर से हम मिल सकते हैं। बाकी वरिष्ठ अधिकारी विभिन्न कारणों से मौजूद नहीं थे। दोपहर के एक बज रहे थे, वो खाना खा रहे थे। उन्होंने हमें लाइब्रेरी के पढ़ने वाले कमरे में बैठने को कहा। यहां दो लोग मौजूद थे जिनके हाथों में अखबार और पत्रिकाएं थे। जब भटनागर जी से बात शुरू हुई तो सबसे पहले यही पूछा कि क्या गांधी संग्रहालय व पुस्तकालय में लोगों की रुचि नहीं रही, इतने कम लोग क्यों हैं! उन्होंने कहा, हमने गांधी को महात्मा कह कर एक दायरे में बांध दिया है। इसलिए गांधी केवल शोध और पीएचडी के विषय बन गए हैं। उ

उन्हें जीवन में उतारने वाले अब नहीं रहे। उन्होंने कहते हैं आज गांधी पर गंभीर शोधकर्ता नजर नहीं आते। यहां आने वाले शोधार्थी शोध जमा कराने के लिए किताबें पढ़ते नहीं केवल किताबों के पन्नों का फोटोस्टेट जमा कर डिग्री हासिल कर लेते हैं। ये भी एक तरह की बेईमानी ही है, इसलिए अब गांधी के देश में कोई गांधी नहीं रहा। लाइब्रेरियन भटनागर ने कहा कि मैं अपने विचारों के साथ कल से सेवानिवृत्त हो रहा हूं। उनका यह कहना बहुत कुछ कह गया। आगे उन्होंने यह भी कहा कि मैंने करीब दो दशक इस संग्रहालय को दिए हैं। इसलिए हक है कि कुछ बोल सकता हूं। उन्होंने कहा कि गांधी के सिद्धांत किसी की जागीर नहीं चाहे वो गांवों का विकास हो या स्वदेशी सामानों की बात। चाहे वो खादी हो या पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांत। सच तो यह है कि गांधी पर हक जताने वालों ने कभी भी उनके सिद्धांतों को नहीं अपनाया। खुद जवाहर लाल नेहरू भी गांधी को मानने से इनकार कर चुके हैं। तो बाद के लोगों से अपेक्षाएं ही बेकार है। दूसरी ओर मुंबई सर्वोदय मंडल के मैनेजिंग ट्रस्टी पीआरके सुमैय्या बताते हैं कि देश के लोगों से ज्यादा विदेशी महात्मा गांधी को तलाशते हैं। एमकेगांधीडॉटओआरजी की वेबसाइट पर हर रोज 200 देशों के तकरीबन 8 हजार लोग गांधी को खोजते हैं। और खोजने वालों में दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका पहले नंबर पर है। ये इस बात का सबूत है कि गांधी जिंदा हैं।

बिहार के चंपारण में गांधी की यात्रा और आंदोलन की 100वीं वर्ष गांठ मनाने की तैयारी में व्यस्त गांधी स्मृति दर्शन के सदस्य दिग्विजय सिंह कहते हैं कि यदि सरकारों ने गांधी के भूदान आंदोलन, पर्यावरण, जाति, न्याय व्यवस्था, ग्रामीण भारत आदि सिद्धांतों का पालन करती तो देश की तस्वीर कुछ और होती। लेकिन सूत और खादी नेताओं के फैशन की चीज बनकर रह गई है जो आम भारतीय की पहुंच से बाहर है।

 

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