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डूसू- खलनायक बनाने की कवायद में नायक बने रॉकी तुसीद

रॉकी तुसीद को मिलने वाली सहानुभूति परिषद के अति आत्मविश्वास और उनके संघ के चुनावी रणनीतिकारों पर भारी पड़ी।
Author नई दिल्ली  | September 14, 2017 01:55 am
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के लिए चुनाव।

चार साल बाद डूसू की सत्ता कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआइ को सौंप कर देश के चोटी के इस विश्वविद्यालय ने कई संदेश दे दिए। गुजरात के मुख्यमंत्री जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हुए थे तो अपनी बात रखने के लिए डीयू के एसआरसीसी कॉलेज पहुंचे थे। लगातार चार सालों से कैंपस में एबीवीपी सत्तारूढ़ थी। इस बार भी वह मजबूत स्थिति में थी। एकतरफा दिख रहा चुनाव ऐसा करवट लेगा, उम्मीद नहीं थी। रॉकी तुसीद का एनएसयूआइ के अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी का हाई कोर्ट से बरकरारी ने संदेश दे दिया कि कहीं न कहीं डीयू का प्रशासन दबाव में था। रॉकी तुसीद को मिलने वाली सहानुभूति परिषद के अति आत्मविश्वास और उनके संघ के चुनावी रणनीतिकारों पर भारी पड़ी। यह पहला मौका है जब किसी उम्मीदवार को प्रचार का समय औरों से कम मिला और वह जीत गया। 48 घंटे में तीन बार एनएसयूआइ ने अपने अध्यक्ष पद के उम्मीदवार घोषित किए।

एनएसयूआइ यह समझाने में कामयाब रही कि चुनाव अधिकारी का फैसला गलत था। अंतिम समय में सारे पुराने मुद्दे गौण हो गए। जिन मुद्दों पर एनएसयूआइ घिर रही थी वो गायब हो गए। उन्होंने चुनाव को मुद्दों व उपलब्धियों से हटाकर ‘न्याय और अन्याय’ पर केंद्रित कर दिया। हवा का रुख पहचानते हुए कांग्रेस के बड़े नेताओं ने कॉलेजवार घूमकर वोट मांगने की जगह परिसर में ही लगातार रैलियां करने और उसमें सिर्फ और सिर्फ रॉकी तुसीद के मुद्दे को हवा दिलवाई। रणनीति रंग लाई और डूसू में परिषद की जगह एनएसयूआइ आई।

परिषद की हार के कई कारण भी हैं। रामजस सहित कई मुद्दों के कारण पूरा परिसर आंदोलनरत रहा। विडंबना रही कि विरोध का जमघट विकास की मांग को लेकर नहीं बल्कि सरकार की कैंपस विरोधी नीतियों मसलन कॉलेजों की स्वायत्तता, रामजस व एसआरसीसी मसला (देशभक्त बनाम देशद्रोही) को समर्पित रहा। किरोड़ीमल कॉलेज में ‘मुÞजफ्फरनगर अभी बाकी है’ के प्रकरण ने कैंपस में महीनों तक अलग बहस छेड़ी रखी। हालांकि यह विवाद मुख्य रूप से एबीवीपी और वाम धड़े के बीच था। लेकिन एनएसयूआइ इस मौके पर आइसा के साथ खड़ी हुई। डीयू में आइसा की स्थिति जेएनयू जैसी नहीं है। वह छात्रों को धन व बाहुबल के पैमाने पर परिषद को पलटने में सक्षम नहीं दिखी, लिहाजा छात्रों ने एनएसयूआइ का साथ दिया। साल में कई बार कैंपस ‘भगवा बनाम अन्य छात्र’ में बंटा रहा। इन सबका खमियाजा भी एबीवीपी को भुगतना पड़ा। इस बार आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। मोदी सरकार विरोधी वाले उनके गुट ने भी एबीवीपी को नुकसान पहुंचाया।

 

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