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इन कारणों से डीयू में खत्म हुई भगवा बादशाहत, मोदी राज में पहली बार एबीवीपी की ऐसी हार

साल 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसके बाद हुए डीयूएसयू चुनाव में 18 साल बाद एबीवीपी ने शीर्ष चार पदों पर जीत हासिल की थी।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ 2017 के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के विजेता कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ (PTI Photo by Vijay Verma)

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शीर्ष दो पदों पर हार की सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। डीयूएसयू में चार साल बाद एबीवीपी को ऐसी हार मिली है। कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सीट पर जीत मिली है। वहीं एबीवीपी को सचिव और संयुक्त सचिव पद पर। हालांकि कांग्रेस ने दावा किया है कि उसे सचिव और संयुक्त सचिव पद पर भी जीत मिली है लेकिन डीयू प्रशासन ने मिलिभगत से एबीवीपी को विजयी घोषित कर दिया। कांग्रेस ने कहा है कि वो डीयूएसयू के चुनाव नतीजे को अदालत में चुनौती देगी। पिछले साल डीयूएसयू के चुनाव में कांग्रेस को केवल संयुक्त सचिव पद पर जीत मिली थी, बाकी तीन मुख्य सीटों पर एबीवीपी जीती थी। साल 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उसके बाद हुए डीयूएसयू चुनाव में 18 साल बाद एबीवीपी ने शीर्ष चार पदों पर जीत हासिल की थी। उसके अगले साल यानी 2015 में भी एबीवीपी ने शीर्ष चारों पदों पर जीत हासिल की थी।

डीयूएसयू में एबीवीपी की हार की कई व्याख्याएं सामने आ रही हैं। बहुत से लोग मान रहे हैं कि डीयू के रामजस कॉलेज में इस साल फरवरी में हुए एक सेमिनार को लेकर हुए विवाद से एबीवीपी को भारी नुकसान हुआ है। एबीवीपी के समर्थकों पर सेमिनार में शामिल होने वाले छात्रों और अध्यापकों के संग मारपीट का आरोप लगा था। माना जा रहा है कि एबीवीपी के समर्थकों की जोरजबरी की राजनीति के खिलाफ छात्रों ने चुनाव में अपनो रोष व्यक्त किया।

डीयूएसयू में एनएसयूआई की जीत के पीछे वामपंथी छात्र संगठनों की मेहनत भी एक वजह बतायी जा रही है। डीयूएसयू से कुछ दिन पहले आए जेएनयू छात्र संघ चुनाव में वामपंथी छात्र संगठनों के साझा उम्मीदवारों ने एबीवीपी को सभी शीर्ष पदों पर हराया था। पिछले कुछ सालों से जेएनयू किसी ने किसी वजह से चर्चा में है। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उपाध्यक्ष शहला रशीद, उमर खालिद समेत कई छात्र नेता मोदी सरकार और बीजेपी की तीखी आलोचना करते रहे हैं। डीयू में वामपंथी छात्र संगठन मजबूत नहीं हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा बीजेपी और एबीवीपी के खिलाफ बनाये गये माहौल का सीधा फायदा कांग्रेस के छात्र संगठन को हुआ है।

ये भी माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार अपने तीन साल के कार्यकाल में लगातार विश्वविद्यालयों में होने वाले विवादों को लेकर आलोचनाओं से घिरती रही है। देश के शीर्ष संस्थानों में छात्रों ने बीजेपी के खिलाफ आक्रोश जताया। हैदराबाद विश्विद्यालय, जादवपुर विश्वविद्लाय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय इत्यादि में किसी न किसी मुद्दे पर छात्र और प्रशासन आमने-सामने आया। हर संस्थान में बीजेपी के प्रति सहानुभूति के कारण एबीवीपी ने प्रशासन का पक्ष लिया। ऐसे में माना जा रहा है कि आम छात्रों के मन में एबीवीपी से नाराजगी है।

एबीवीपी की हार की एक वजह नरेंद्र मोदी सरकार की शिक्षा नीति भी मानी जा रही है। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट), एमफिल-पीएचडी की सीटें, शैक्षणिक संस्थानों के वित्त पोषण, उनकी स्वायत्तता से जुड़े जो फैसले किए उससे आम छात्रों और अध्यापकों में नाराजगी है जिसका असर चुनाव नतीजों में देखने को मिल रहा है।

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