May 29, 2017

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एससीएसटी ओबीसी टीचर्स फोरम ने विश्वविद्यालय से पूछा- कहां गए आवेदन के डिमांड ड्राफ्ट ?

कॉलेजों की ओर से नौकरी के नाम पर ऐसी छूट देने की बात तो दूर पैसे लेकर भी साक्षात्कारों का आयोजन नहीं किया।

Author प्रियरंजन | October 5, 2016 05:47 am
दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली विश्वविद्यालय के आरक्षित कोटे के एडहॉक शिक्षक कॉलेजों के रवैये से खफा हैं। उन्होंने महीनों पहले सक्षात्कार का विज्ञापन निकाल व लाखों बटोर कर चुप्पी साधने के जुगत को आड़े हाथों लिया है। किसी ने इसे लूट बताया है तो किसी ने तुरंत साक्षात्कार आयोजित करने की मांग की। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के कम से कम 30 से ज्यादा कॉलेजों ने करीब एक साल पहले स्थायी नियुक्ति का विज्ञापन निकाला। ओबीसी उम्मीदवारों से 500-500 रुपए, एससीएसटी व दिव्यांग कोटे के अभ्यर्थियों से 250-250 सौ रुपए के साथ आवेदन मांगे थे। लेकिन अभी तक उनका कुछ नहीं हुआ। कुछ कॉलेजों ने खानापूर्ति जरूर की। लेकिन इस आवेदन से इतर विज्ञापन निकाल कर साक्षात्कार आयोजित किए।

इस मामले को एससीएसटी ओबीसी टीचर्स फोरम की ओर से कुलपति के समक्ष उठाने ने तूल पकड़ लिया है। फोरम के पदाधिकारियों ने कॉलेजों पर वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाकर पूछा है कि इस बाबत साक्षात्कार कब आयोजित होगें? उन्होंने दावा किया कि नौकरी पक्का करने के लिए बेरोजगारी का दंश झेल रहे शिक्षकों से पैसे वसूल कॉलेजों ने लाखों बनाए। दाखिले के समय भी ओबीसी/एससीएसटी व दिव्यांग कोटे के अभ्यार्थियों को आर्थिक रूप से छूट दी जाती रही है। लेकिन कॉलेजों की ओर से नौकरी के नाम पर ऐसी छूट देने की बात तो दूर पैसे लेकर भी साक्षात्कारों का आयोजन नहीं किया। आरक्षित वर्ग के तदर्थ शिक्षकों ने साक्षात्कार के मुद्दे में देरी को मानव अधिकार के साथ जोड़ा है। उन्होंने कहा कि करीब आधे से ज्यादा सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग मसलन अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी वर्ग से हैं। इस कोटे के तदर्थ शिक्षकों का भविष्य पूरी तरह अधर में है।

नए कुलपति के आने के बाद भी स्थायी नियुक्तियां बंद हैं। इस बाबत तदर्थ शिक्षक राष्ट्रपति तक से गुहार लगा चुके हैं। 2000 से ज्यादा हस्ताक्षरित ज्ञापन सौंप चुके हैं। उन्होंने कहा-आरक्षण के लिए तय किए रोस्टर के तहत जो रखे गए वे अयोग्य कैसे? अगर नहीं तो स्थायी क्यों नही?  तदर्थ शिक्षकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर पारदर्शिता न बरतने और आर्थिक घालमेल का आरोप लगाया। उन्होंने पूछा कि आखिर करोड़ों रुपए कहां गए? अगर साक्षात्कार नहीं लेना था तो विज्ञापन क्यों दिया गया और अगर किसी वजह से साक्षात्कार रुक गया तो इसकी जानकारी अभियार्थियों को क्यों नहीं दी गई। उन्होंने डीयू से ‘टीचर्स प्लेसमेंट सेल’ बनाने की मांग की है।

विद्वत परिषद के सदस्य प्रो हंसराज सुमन ने कहा कि ‘टीचर्स प्लेसमेंट सेल’ बनाने की मांग उनकी ओर से भी बैठक में उठाई है। एक अन्य शिक्षक ने कहा कि 10-12 सालों से कॉलेजों में पढ़ा रहे तदर्थ शिक्षकों का साक्षात्कार भी लेना एक तरह से अब अनुचित है। उन्होंने पूछा, ‘वे किस मामले में अयोग्य हैं। सालों से पढ़ा रहे हैं। उनका चयन विशेष चयन समिति की ओर से होता है। विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे है।

इंटक के अश्विनी शंकर ने कहा कि प्राचार्यों की ओर से कई मामलों में पारदर्शिता कम हो रही है। तदर्थ शिक्षकों का शोषण बढ़ा है। साक्षात्कार अविलंब शुरू किए जाने चाहिए। विश्वविद्यालय के शिक्षक राजीव कुंवर ने कहा, ‘यह स्थायी नियुक्ति से जुड़ा मसला है। नियुक्ति के बाबत शुल्क पहले नहीं लिए जाते थे। यह नई परंपरा शुरू हुई है। कॉलेजों को नियुक्ति के स्थगन से जुड़ी जानकारी आवेदकों को देनी चाहिए। यब भी संभव है कि जब भी नियुक्तियां शुरू हो पहले के आवेदकों का आवेदन उसी शुल्क में वैध माना जाए।

 

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First Published on October 5, 2016 5:47 am

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