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डेंगू और चिकनगुनिया: कोर्ट की फटकार के बाद हरकत में आई दिल्ली सरकार

दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं था, जहां हर दूसरे घर में डेंगू और चिकनगुनिया का कोई मरीज न रहा हो।
Author नई दिल्ली | October 8, 2016 03:43 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतकिरण के लिए किया गया है।

दिल्ली सरकार और सरकारी एजंसियों को डेंगू और चिकनगुनिया की रोकथाम का जो काम मई में करना था, वह अब सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद किया जा रहा है। वैसे जाड़े में भी डेंगू के मच्छर पूरी तरह खत्म नहीं होते हैं, लेकिन उनका असर कम हो जाता है। अक्तूबर आते-आते यह दिखने भी लगा है। हर तरफ से यही रिपोर्ट आ रही है कि दिल्ली में डेंगू और चिकनगुनिया के मरीजों की संख्या में कुछ कमी आई है।  सरकारी एजंसियों की लापरवाही के कारण भले ही इन बीमारियों से मरने वालों का सही रिकार्ड न बन पाया हो, लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं था, जहां हर दूसरे घर में डेंगू और चिकनगुनिया का कोई मरीज न रहा हो। इस बार डेंगू से ज्यादा चिकनगुनिया का असर रहा, जिसके मरीज महीनों जोड़ों के दर्द से परेशान रहे। ऐसा पहली बार हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट से डांट खाने और दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री पर जुर्माना लगने के बावजूद सरकार सक्रिय न दिखी हो।

साल 1997 में दिल्ली पहली बार डेंगू का शिकार हुई। तब यहां भाजपा की सरकार थी और डॉ हर्षवर्धन दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री थे। अब केंद्र सरकार में मंत्री बन चुके डॉ हर्षवर्धन बताते हैं कि कभी लगा ही नहीं कि यह समस्या केवल दिल्ली सरकार की है क्योंकि दिल्ली सहित पूरी केंद्र सरकार सक्रिय हो जाती थी। रोजाना दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री की अगुवाई में स्वास्थ्य से जुड़े विभागों की बैठक होती थी। किसी ने भी अधिकारों का सवाल नहीं उठाया। दिल्ली सरकार के साथ-साथ नगर निगम, केंद्र सरकार, एनडीएमसी और छावनी बोर्ड के स्वास्थ्य विभाग की रोजाना समीक्षा होती थी। तब के मुख्यमंत्री साहिब सिंह ही नहीं, बाद में कांग्रेस सरकार में 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने भी हरसंभव प्रयास करके इस बीमारी को फैलने से रोकने और कम नुकसान होने का प्रयास किया।

कांग्रेस सरकार में लंबे समय तक स्वास्थ्य मंत्री रहे डॉ अशोक कुमार वालिया ने सबसे ज्यादा समय तक इन बीमारियों का मुकाबला किया। उनका कहना है कि कभी भी यह लगा ही नहीं कि इस मुद्दे पर कौन-कौन से विभाग दिल्ली सरकार के अधीन नहीं है। केंद्र सरकार से लेकर नगर निगम,मलेरिया विभाग आदि के अधिकारी कर्मचारी पूरी ताकत से एकजुट होकर काम करते थे। डॉ वालिया ने बताया कि बरसात शुरू होने से पहले अप्रैल-मई में ही नालों की सफाई से लेकर यमुना नदी से हरे स्लिट हटाने का काम शुरू कर दिया जाता था। बड़े पैमाने पर मच्छर पैदा होने पर अधिकारियों व घरवालों को जिम्मेदार ठहराया जाता था और उनसे जुर्माना वसूला जाता था। सरकारी अस्पतालों में तो रेड अलर्ट जारी किए ही जाते थे, निजी अस्पतालों में भी विशेष बिस्तर तैयार कराए जाते थे। बड़े पैमाने पर मुफ्त या कम कीमत में जांच करवाने की व्यवस्था करवाई जाती थी।

उन्होंने कहा कि इस बार जिस तरह का जलभराव पूरी दिल्ली में हुआ, उससे पहले से ही बड़े स्तर पर डेंगू और चिकनगुनिया होने का अंदेशा था, लेकिन किसी स्तर पर सरकार की कोई तैयारी नहीं दिखी। लगता ही नहीं कि दिल्ली में कोई सरकार है। पहले तो नालों की सफाई पर राजनीति हुई। निगम और सरकार ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए। सरकारी स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं होने से लोग खुद अपने सामर्थ्य से इलाज करवा रहे हैं। इसी के कारण सरकारी रिकार्ड में मरीजों की संख्या ज्यादा नहीं बढ़ी।  वालिया ने आगे कहा कि दिल्ली में सरकार चलाने वालों को अपनी राजनीति से ही फुरसत नहीं है, इसलिए लोग भगवान भरोसे रहने को मजबूर हैं। हालात इतने खराब हो गए कि सीधे सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने केवल निर्देश नहीं दिया, बल्कि लगातार कार्रवाई की निगरानी भी की और मुख्यमंत्री को इस मुद्दे पर उपराज्यपाल के साथ बैठक करने को मजबूर किया। इसका लाभ होता भी दिख रहा है और अस्पतालों में इन रोगों के मरीजों की संख्या कम हो गई है। यही कारवाई पहले हो जाती तो कई जानें बच जातीं।

 

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