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दिल्ली मेरी दिल्ली: अरविंद केजरीवाल हर समय मीडिया में बने रहने की तरकीब खोजते रहते हैं

कुछ दिन तो लगा ही नहीं कि केजरीवाल राजनीति में सक्रिय भी हैं, लेकिन बवाना उपचुनाव जीतने के बाद वे फिर से फॉर्म में आ गए।
Author September 25, 2017 02:40 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

टकराव की आहट
दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल हर समय मीडिया में बने रहने की तरकीब खोजते रहते हैं। हालांकि कई चुनावों में मिली हार और भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उन्होंने कई महीनों तक चुप्पी साध रखी थी। कुछ दिन तो लगा ही नहीं कि केजरीवाल राजनीति में सक्रिय भी हैं, लेकिन बवाना उपचुनाव जीतने के बाद वे फिर से फॉर्म में आ गए। वहीं उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली सरकार के कई फैसलों पर पाबंदी लगाकर आप नेताओं को फिर से सुर्खियों में आने का मौका दे दिया है। यह अलग बात है कि आप सरकार कई मामलों में पहले की तरह ही अपने हिसाब से फैसला लेने लगी थी, ऐसे में देर-सवेर टकराव तो होना ही था।

आस्था की खातिर
दुर्गा पूजा में दिल्ली पुलिस भी धार्मिक हो जाती है। सुरक्षा व्यवस्था से लेकर बड़ी रामलीलाओं के बाहर उनकी तैनाती उन्हें भी सनातन धर्म की याद दिला देती है। लाल किले के सामने बने पंडाल पर तैनात एक जवान से बेदिल का पाला पड़ा। गेट पर तैनात इस जवान पर पार्किंग की देखरेख का जिम्मा है। उसे इस बात पर नजर रखनी है कि लोग इधर-उधर या बेतरतीबी से गाड़ियां न खड़ी करें। बेदिल ने जब उससे पूछा कि कितने घंटे की ड्यूटी है तो जवान कहा कि दुर्गा पूजा में ड्यूटी आवर नहीं देखा जाता। धार्मिक कार्यक्रम में जब तक आयोजकों को हमारी जरूरत रहेगी, हम तैनात रहेंगे। उसने सलाह देने वाले अंदाज में कहा, साल में एक बार धर्म-कर्म पर भी ध्यान देना चाहिए। इतना ही नहीं, उसने यह भी बताया कि वह नौ दिन तक बिना नमक वाला खाना खाकर दिन-भर यहां खड़ा रहता है।

कमेटियों की भरमार
मनोज तिवारी ने भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद थोक में पदाधिकारी बना डाले। जो नेता सीधे पदाधिकारी नहीं बन पाए उन्हें तरह-तरह की कमेटियां बना कर उसमें शामिल कर दिया गया। यह अलग बात है कि कमेटियों की जिम्मेदारी तय करने में न तो वरिष्ठता की ध्यान रखा गया है और न ही योग्यता का। इतना ही नहीं, इतनी ज्यादा कमेटियां बना दी गई हैं कि प्रदेश अध्यक्ष को भी नहीं पता होगा कि पदाधिकारी कितने हैं और कमेटियां कितनी हैं। वहीं कमेटियों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि अगर इनकी बैठक कराई जाए तो महीने भर बाद भी दूसरी कमेटी का नंबर नहीं आएगा। ऊपर से इतने सारे लोगों को काम बांटना भी टेढ़ी खीर है।

एक के साथ एक मुफ्त
दिल्ली नगर निगम में आधी सीटों पर महिलाओं को आरक्षण क्या मिला, उनके पतियों की चांदी हो गई। सुनने में थोड़ा अटपटा लगता है, लेकिन यह हकीकत है। इसका खुलासा भी किसी और ने नहीं, बल्कि एक निगम पार्षद के पति ने ही किया। उनका कहना था कि पत्नी जबसे पार्षद बनी है उनके घर दो-दो आमंत्रण आने शुरू हो गए हैं। इलाके के लोगों की मांग होती है कि मैडम के साथ आप भी आएं। मैडम को तो पार्षद कहा ही जाता है, लेकिन उनके पति महाशय को भी पार्षद पति की उपाधि से नवाजा जाता है। निगम अधिकारी भी दोनों को ही पार्षद मानकर उनकी आवभगत करते हैं। यानी एक के साथ एक मुफ्त।

परदे के पीछे
तू डाल-डाल मैं पात-पात! यह वाकया पिछले दिनों गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल पर सटीक बैठता दिखा। अस्पताल की चौथी मंजिल पर हृदय रोग विभाग है, जहां आम जनता को दलालों से सतर्क रहने के निर्देश वाले बोर्ड लगाए गए हैं। इनमें कहा गया है कि डॉक्टर को दिखाने में सहूलियत या जांच के नाम पर अगर कोई पैसे मांगता है तो इसकी शिकायत ‘फलां’ जगह करें। बोर्ड पर शिकायत दर्ज करने वाले का पद नाम व फोन नंबर भी दिया गया है, लेकिन जिस जगह पर पद व फोन नंबर लिखा है, उस जगह को ब्लेड से काट कर हटा दिया गया है। बहरहाल इसे लेकर वहां चर्चा आम थी कि सीसीटीवी होने का दावा करने वाला अस्पताल प्रशासन जब खुली आंखों से ‘परदे वाले पोस्टर’ को न देख सका तो परदे के पीछे के खेल को कैसे देख पाएगा।
-बेदिल

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