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दिल्ली मेरी दिल्ली- आरामतलबी के मजे

अंदरूनी कलह में फंसी सरकार खुद न तो कोई काम कर रही है और न ही अधिकारियों को कुछ करने दे रही है।
Author May 15, 2017 02:47 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (photo source – Indian express)

आरामतलबी के मजे

राजधानी में काम करने वाले अधिकारी केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल में तनातनी से मजे में हैं। पिछले साल 4 अगस्त को हाई कोर्ट की ओर से उपराज्यपाल को दिल्ली का शासक घोषित किया गया था। उसके बाद से तो अधिकारी काम न करने के बहाने खोजने लग गए हैं। संयोग से हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दिल्ली सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश देने के बजाए उसकी सुनवाई संविधान पीठ में करवाना तय कर दिया। इसके बाद आम आदमी पार्टी (आप) में कलह शुरू हो गई और विवाद इतना बढ़ गया कि सरकार के वजूद पर ही सवाल उठने लगे। अंदरूनी कलह में फंसी सरकार खुद न तो कोई काम कर रही है और न ही अधिकारियों को कुछ करने दे रही है। ऐसे में अफसरों को और मौके मिल गए आरामतलबी के। अब तो कोई जरूरी काम निपटाने के लिए भी मंत्रियों को अधिकारियों के साथ खासी मशक्कत करनी पड़ रही है।

राजनीति का राग
दिल्ली नगर निगम चुनाव जीतने के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी की हैसियत न केवल भाजपा बल्कि दिल्ली की राजनीति में भी बढ़ गई है। अब तक उनकी छवि भोजपुरी गायक और कलाकार की थी, लेकिन निगम चुनावों ने उन्हें सही मायने में नेता बना दिया। उनके समर्थक तो अब उन्हें दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखने लगे हैं। भाजपा के जो नेता उन्हें बाहरी बताकर उनकी आलोचना करते थे वे ही उनकी जी-हुजूरी में लग गए हैं। दिल्ली में वैसे तो विधानसभा चुनाव अभी काफी दूर है, लेकिन आप के झगड़े से ऐसा माहौल बन गया है कि कभी भी मध्यावधि चुनाव हो सकता है। ऐसे में अपने मनोज तिवारी की सक्रियता तो बढ़ेगी ही। तभी तो वो कहते हैं कि गाना तो गाएंगे, लेकिन अब सिनेमा नहीं, अब तो सिर्फ राजनीति होगी।

हार का सबक
नगर निगम चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने बीते दिनों इस्तीफा दिया, जोकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नहीं स्वीकारा। उनसे दो मुलाकातों के बाद माकन ने वापस दिल्ली के कामकाज में जुट गए। लेकिन निगम चुनाव की हार से उन्होंने सबक जरूर लिया। चुनाव के बाद पहली बार 37 पूर्व विधायकों के साथ वे उपराज्यपाल को ज्ञापन देने पहुंचे और दिल्ली कांग्रेस की बैठक में भी पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों और पूर्व सांसदों को महत्त्व देना शुरू किया। अजय माकन कांग्रेस की हार से ज्यादा उसके तीसरे नंबर पर खिसक जाने से परेशान हैं। उन्हें लगता था कि आप के साथ जाने वाले अल्पसंख्यक इस चुनाव में वापस कांग्रेस के पास आ जाएंगे। हालांकि अगर वे सभी को जोड़कर चलें तो शायद आनेवाले दिनों में कुछ और बदलाव दिखे।
पार्षदों की परेशानी
सालों तक निगम पर काबिज रहे अनुभवी पार्षदों के पास अब सिवाए फोटो खिंचवाने के कोई काम नहीं बचा है। निगम में महत्त्वपूर्ण पदों पर रह कर मलाई काट चुके इस तरह के कद्दावर पार्षदोें का रोना साफ नजर आ रहा है। दिल्ली नगर निगम में मेयर, उपमेयर, स्थायी समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की चुनाव प्रक्रिया के दौरान जिस तरह दिग्गजों को दरकिनार किया जा रहा है और नौसिखिए नेताओं को आगे लाया जा रहा है, उससे पुराने व कद्दावर माने जाने वाले पार्षदों की स्थिति देखने लायक है। खुशी जताने के लिए वे नए पदाधिकारियों के चुनाव में फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं। बेदिल ने जब पूर्वी दिल्ली के चुनाव में उत्तरी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली के नेताओं को देखा तो कौतुहलवश एक नेता से पूछ लिया। उनका जवाब था- भाई अब निगम में पांच साल दिखाई नहीं पड़ेगे तो कम से कम एक आखिरी फोटो तो खिंचवा ली जाए।
मोर्चे पर मंत्री
घर का भेदी लंका ढाए! कपिल मिश्रा और केजरीवाल प्रकरण पर यह बात सटीक बैठती है। दरअसल बीते दिनों कपिल मिश्र को आप की कैबिनेट से हटाए जाने की खबर क्या मिली, उन्होंने केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अचानक उनके पिटारे से खुफिया खबरें निकलने लगीं और रोजाना कोई न कोई खुलासा होने लगा। ऐसे में दबी जुबान में किसी ने कहा कि कपिल ने मानो प्रण ले रखा है कि मैं मंत्री नहीं तो तुम मुख्यमंत्री नहीं! लेकिन सवाल यह है कि इन सबके पीछे है कौन? या फिर कहीं नेताजी ही तो फुल फ्लेज्ड सीएम बनने के चक्कर में नहीं हैं।
नाम का प्रमोशन
दिल्ली पुलिस में ट्रांसफर और पोस्टिंग तो दोबारा शुरू हो गई है, लेकिन प्रमोशन की फाइल आगे नहीं बढ़ रही है। अमूल्य पटनायक से पहले पुलिस आयुक्त रहे आलोक कुमार वर्मा ने प्रोन्नति का रिकॉर्ड बनाया था। एक ही बार में 25 हजार लोगों की प्रोन्नति ने उन्हें इस कदर चर्चित कर दिया था कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी एक कार्यक्रम में इसका जिक्र करना पड़ा था। हालांकि उस प्रोन्नति में स्पेशल ग्रेड प्रमोशन वालों की संख्या ज्यादा थी। महकमे में चर्चा है कि दोबारा स्पेशल ग्रेड प्रमोशन वालों की सूची बनाई जा रही है। जैसे ही कांस्टेबल से लेकर ऊपर के अधिकारी स्तर तक संख्या बल पूरा हो जाएगा दोबारा प्रोन्नति की सूची जारी हो जाएगी। इसी तरह प्रमोशन पाए एक एएसआइ ने बताया कि दरअसल उन्हें सिर्फ वर्दी और बैज मिला है। सुविधाएं तो वही हैं जो पहले मिलती थीं। 20 से 25 साल के बाद उन्हें इस तरह का प्रमोशन देकर सिर्फ संख्याबल को पूरा किया गया है।
-बेदिल

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