December 09, 2016

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दिल्ली: यह धुंध आज नहीं कल को भी करेगी बीमार

भ्रूण के दिमाग तक में यह बुरा असर डालती हैं जो उन्हे जन्मजात मानसिक व दिमागी विकलांग भी बना सकती है।

दिल्ली में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है।

पटाखों व अन्य रासायनिक पदार्थों के जलने से निकलने वाला घातक धुआं सेहत पर वैसा ही असर डालता है जैसा भोपाल गैस कांड में जहरीली गैस रिसाव से हुआ था। इसकी तीव्रता थोड़ी कम हो सकती है। इसके प्रभाव से न केवल मौजूदा पीढ़ी बीमार हो रही है बल्कि भावी पीढ़ी भी कई तरह का मर्ज लिए जन्म लेगी। चिंता की बात यह भी है कि इसका कोई इलाज भी नहीं है। बचाव ही उपाय है। पर्यावरणीय व पेशेगत स्वास्थ्य केंद्र के निदेशक डॉक्टर टीके जोशी ने ये भयावह तथ्य बताते हुए कहा कि यह ऐसा समय है कि हम पटाखों के नमूने लें, उनके संघटकों का विस्तृत अध्ययन कराएं व जरूरी हो तो उसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करें।

डॉक्टर टीके जोशी ने कहा कि यहां जो हालात बने हैं वैसे कभी नहीं रहे। इसे प्रकृति की चेतावनी बताते हुए डॉक्टर जोशी ने कहा कि पटाखों में प्रयोग किए जाने वाले तमाम तरह के रासायनिक पदार्थ जैसे कैडमियम, क्रोमियम, पोटैशियम, जिंक लेड, मर्करी सहित तमाम भारी तत्त्वों के जलने के बाद निकलने वाली जहरीली गैस का असर कमोबेस वैसा ही स्थाई प्रभाव छोड़ती है जैसा कि 1984 में भोपाल में हुए अमोनियम साइनाइड गैस रिसाव का हुआ था। इसकी तीव्रता भले कम हो पर नुकसान वैसा ही है। इसके प्रति आगाह करते हुए उन्होंने बताया कि इससे फेफड़ों मे जो असर होता है उसे केमिकल न्यूमोनाइटिस कहते हैं। इससे गले में केमिकल लिरिंगाटिस, सांस की नली में केमिकल ब्रोंकाइटिस जैसी घातक बीमारियां हो जाती हैं।

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भ्रूण के दिमाग तक में यह बुरा असर डालती हैं जो उन्हे जन्मजात मानसिक व दिमागी विकलांग भी बना सकती है। डॉक्टर जोशी ने कहा कि आमतौर से जो न्यूमोनिया वगैरह होते हैं उसका इलाज है। लेकिन रासायनिक पदार्थों के जलने से फेफड़ों को होने वाले नुकसान का कोई इलाज नहीं है। यह जहां पहुंचते हैं उन कोशिकाओं को स्थाई नुकसान पहुंचाते हैं। गले में सूजन, आंखों मे जलन, सांस लेने में तकलीफ, साइनस की दिक्कत खांसी जुकाम में बढ़ोतरी हो रही है। नुकसान का आलम तो यह भी है कि इस धुएं से जान भी जा सकती है। इसलिए अब जरूरी हो गया है कि कड़े कदम उठाए जाएं।

उन्होंने हैरानी जताते हुए कहा कि इतना घातक होने के बावजूद आज तक बाजार से कभी पटाखों के नमूने उठा कर उनकी प्रयोगशालाओं में कोई जांच तक नहीं की गई कि पता चले कि उनमें कौन से तत्त्व किस मात्रा में मौजूद हैं। भारत में किसी पटाखे का कोई अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है। अपने केंद्र की तरफ से वे ऐसी पहल करना चाहते हैं कि कम से कम इनके अध्ययन किए जाएं व जरूरी लगे तो पटाखों पर पूरी तरह रोक लगे। वे इसकी सिफारिश अगले हफ्ते इंडिया हैबिटाट सेंटर में होने वाले सम्मेलन में करेंगे। जिसमें केंद्रीय पर्यारण मंत्रालय व दिल्ली के भी अधिकारी मौजूद रहेंगे। क्योंकि जो हालात है वह चीन की हवा से भी खराब है। इसे रोकना ही एक उपाय है क्योंकि मास्क वगैरह व्यवाहारिक कदम नहीं है और जो लोग मास्क लगाते भी हैं वह सही से लगाना नहीं जानते, न ही सभी को सही मास्क मिल पाता है। हर कोई एअर प्यूरीफायर खरीद नहंीं सकता।

 

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First Published on November 6, 2016 3:27 am

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