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दर्शन देहू न अपार हे दीनानाथ…

दिल्ली में राष्ट्रपति शासन में 2014 में छठ को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया।
Author नई दिल्ली | November 6, 2016 03:56 am
छठ पर्व के गीतों में परंपरा की महक होती है। इन गीतों से छठ पूजा का विधि-विधान और पारंपरिक कथाएं जुड़ी हैं।

लोक आस्था के महापर्व छठ के दूसरे दिन खरना संपन्न हुआ। छह नवंबर रविवार को डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर मुख्य पर्व की शुरुआत की जाएगी।
सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर इस पर्व का समापन होगा। बिना पुरोहित और बिना किसी मंत्र के बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाला यह पर्व अब दिल्ली और एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) का भी मुख्य पर्व बन गया है। इस इलाके में रहने वाले लाखों पूर्वांचल के प्रवासी (बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी) सालों से दिल्ली में ही अपने गांव-शहर के जैसा छठ मनाने के प्रयास में लगे रहते हैं।

कभी दिल्ली में छठ पूजा के सामान के लिए बाजार-बाजार भटकने वाले लोगों के लिए दिल्ली-एनसीआर ही पूरा बाजार दिखने लगा है। क्या न्यू अशोकनगर, लक्ष्मी नगर, शाहदरा जैसे पूर्वी दिल्ली के इलाके ही नहीं पालम, नजफगढ़, नरेला से लेकर बाहरी दिल्ली के हर बाजार तो पहाड़गंज, करोलबाग से लेकर दक्षिणी दिल्ली और वीआइपी कहे जाने वाले नई दिल्ली का कोई बाजार ऐसा नहीं है जहां पिछले तीन दिन से छठ का सामान बिक न रहा हो।

दिल्ली एनसीआर में कम से कम सौ करोड़ का छठ का बाजार बन चुका है। लोक आस्था के इस पर्व में पूजा की सामग्री इस तरह की होती है कि गरीब से गरीब भी इस पर्व को उसी उत्साह से मना सके जिस तरह से अमीर। मूली, सुथनी, अदरख, ईख, केला, कसार, ठेकुआ और इस समय आसानी से मिलने वाले फलों से पूरी पवित्रता के साथ मनाए जाने वाले इस पर्व की तैयारी छठ समाप्त होते ही अगले छठ की हो जाती है। साठी धान और फिर छठ के लिए अलग से गेहूं रखना, उसे साल भर बचाकर, किसी भी तरह से छठ से जुड़ी सामग्री को जानवरों, चिड़ियों से बचाने की जुगत महीनों चलती है। दिल्ली भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दूबे बताते हैं कि साठ के दशक में उनकी मां दिल्ली में छठ करती थीं तो बड़ी कठिनाई से व्रत का सामान पहाड़गंज आदि से जुटा पाते थे। कुछ सामान तो गांव से आता था। तब तो नई दिल्ली की सरकारी कालोनियों में रहने वाले कुछ परिवार या कुछ प्रवासी मजदूर ही छठ करते थे।

अस्सी के दशक से दिल्ली में पूर्वांचल के लोगों की संख्या बढ़ी और दिल्ली में छठ मनाने वालों की तादात बढ़ती गई। संख्या बढ़ने से पूर्वांचल के लोग दिल्ली-एनसीआर में राजनीतिक ताकत बनने लगे। बावजूद इसके इस पर्व में लोगों की पहली पसंद अपने गांव-शहर जाने की होती है। संख्या ज्यादा होने और कई-कई पीढ़ी दिल्ली में रह जाने के कारण कई लोगों का अपने मूल निवास से संपर्क कम हो गया है। दूसरे दिल्ली-एनसीआर में वे सहुलियतें मिलने लगी जो लोगों को अपने गांव-शहर में मिलती थी। वोट की राजनीति और पूर्वांचल के लोगों के दबाव में दिल्ली सरकार ने 2000 में छठ के दिन ऐच्छिक अवकाश की घोषणा की। 2010 में केंद्र सरकार ने ऐच्छिक अवकाश घोषित किया।

दिल्ली में राष्ट्रपति शासन में 2014 में छठ को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया। दिल्ली बिहार और झारखंड के बाद तीसरा राज्य बना जहां छठ के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित हुआ। अब तो उत्तर प्रदेश, बंगाल और उत्तराखंड के चार तराई जिलों में छठ के दिन ऐच्छिक अवकाश है। दिल्ली में सरकार के सहयोग से बनने वाले छठ घाटों में भी लगातार बढ़ोतरी होती गई। सरकार की ओर से घाटों को बनाने की शुरुआत दिल्ली में 1993 में बनी भाजपा सरकार ने की थी। उसकी संख्या कांग्रेस सरकार में लगातार बढ़ती गई। पिछली बार आम आदमी पार्टी की सरकार ने सरकारी घाटों की संख्या बढ़ाकर 180 कर दी। इस बार इसे बढ़ा कर 278 किया गया है। इसके अलावा लोग अपने घरों के पास घाटों का निर्माण करके पूजा करते हैं। सरकारें भी सजग हो गई हैं। यमुना और हिंडन नहर में पानी आ चुका है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर लोग घाटों को सजाने में लगे हुए हैं।

शुक्रवार को नहाय-खाय के साथ चार दिन के पर्व की शुरुआत हुई शनिवार शाम खरना के लिए खीर बना और उस प्रसाद को लेने के लिए घर-परिवार के लोगों के अलावा नेताओं में होड़ लगी हुई थी। रविवार को डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर मुख्य पर्व की शुरुआत होगी। रात को घरों के आंगन में और छठ घाटों पर कोशी पूजा होगी और सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर स्वच्छता और पवित्रता के लोक आस्था के इस महापर्व का समापन करेंगे।

 

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