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अपने दम पर बदलाव लाते झुग्गियों के ‘बाल नायक’

इस बदलाव का श्रेय जाता है पांचवीं से आठवीं कक्षा के उन छात्रों को, जो पढ़ते तो सरकारी स्कूल में हैं, लेकिन उनके इरादे और हौसले किसी से कम नहीं हैं।
Author नई दिल्ली | November 15, 2017 03:42 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

नरेला की मलिन बस्ती और वहीं के पॉकेट-11 की पुनर्वास कालोनी में कूड़ा उठाने वाली निगम की गाड़ी अब रोज आती है। पहले यह हफ्ते में आती थी। इतना ही नहीं, यहां बने पार्कों में अब बच्चे खेल सकते हैं क्योंकि जहां पहले कूड़ा डाला जाता था वहां अब स्ट्रीट लाइटें लग गई हैं। नरेला की ये बस्ती अकेली नहीं है, जिसकी सूरत बदली है। यहां की कम से कम 22 झुग्गी-झोपड़ियों में यह बदलाव आया है। दिल्ली की 6343 झुग्गियों की तुलना में यह आंकड़ा भले ही कम हो, लेकिन प्रयास के स्तर पर मील का पत्थर साबित हो सकता है।  इस बदलाव का श्रेय जाता है पांचवीं से आठवीं कक्षा के उन छात्रों को, जो पढ़ते तो सरकारी स्कूल में हैं, लेकिन उनके इरादे और हौसले किसी से कम नहीं हैं। इस काम में 11 जिलों की 22 झुग्गियों के 96 बच्चे शामिल हैं, जिनमें ज्यादातर छात्राएं हैं। इन बच्चों ने सरकार से अपने लिए खास पहचान की मांग की है। इन बच्चों की मांग जायज भी है क्योंकि उन्होंने अपनी मलिन बस्तियों को आदर्श बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई है। इलाके के विधायक और पार्षद भी अब इन बच्चों को इनके नाम से जानने लगे हैं।

नरेला की मलिन बस्ती में रहने वाली पांचवीं की छात्रा श्वेता और पॉकेट-11 की पुनर्वास कालोनी की नेहा ने कहा कि बीते दो महीने तक हमने अपने मोहल्लों में जो काम किया, उनमें स्थिति का सर्वे, मूलभूत जरूरतों की स्थिति, साफ-सफाई और पढ़ाई के अलावा शौचालयों व पार्कों की सुविधा का बच्चों के स्तर पर आकलन शामिल था। यह सब उन्होंने ‘हमारा बचपन’ अभियान के तहत किया। नरेला के विधायक का कहना है कि जो काम बच्चों के माता-पिता नहीं करा पाए, वो काम इन बच्चों ने कर दिखाया। इन बच्चों के इरादों के आगे अधिकारियों को झुकना पड़ा और स्थिति बदल गई। अब आगे क्या, इस सवाल पर बदरपुर जेजे कालोनी में रहने वाली शिवानी ने कहा कि हम चाहते हैं कि सरकार हमें ‘एक्टिव सिटिजन’ के रूप में मान्यता दे ताकि दूसरे बच्चे भी इस काम के लिए आगे आएं। श्वेता बताती हैं कि शुरुआत में बस्ती की कई महिलाओं ने तंज कसा, लेकिन अब वे मानती हैं कि हम सही थे। लालकुआं की मलिन बस्ती के छात्र दीपांशु सिंह के अलावा रोहित, मनसा, अनु व नेहा जैसे कई नाम उन 96 बच्चों में शामिल हैं जिन्होंने खुद की पहचान ‘बाल नायकों’ के रूप में बनाई है।
इस अभियान के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य भी सामने आए।

मसलन सुलतानपुरी की के व एच ब्लॉक (मछली मार्केट) की झुग्गियां नशीले पदार्थों की बिक्री और जिस्मफरोशी का अड्डा बन चुकी हैं। हालांकि यहां के कई बच्चों ने अब नशा छोड़ दिया है, लेकिन उन्हें मलाल है कि वे अपने माता-पिता को नहीं सुधार पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसी योजना लानी चाहिए जिससे उनके पिता की जगह उनकी मांओं को आर्थिक रूप से मजबूती मिले। इस बारे में बच्चों के बीच काम करने वाले तरुण कुमार शर्मा और ‘हमारा बचपन’ के आकाश श्रीवास्तव ने कहा कि कुछ मामलों पर तो हमने काम किया है, लेकिन सुलतानपुरी जैसे कुछ मामले तो पुलिस ही खत्म कर सकती है। उन्होंने कहा कि यहां के बच्चों में सुधार है। सैकड़ों बच्चों ने नशे को ना कहा है लेकिन उनके माता-पिता बदलने को तैयार नहीं हैं। एक अन्य गैर-सरकारी संस्था के वरिष्ठ सदस्य उमेश कुमार ने कहा कि बच्चों की पहल को महत्त्व और मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मलिन बस्तियों में रहने वाले किसी बच्चे को ब्रांड अंबेसेडर बना कर उनकी पहलों से बड़ा सुधार लाया जा सकता है।

 

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