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मनमानी कर अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी कर रही ‘आप’ सरकार

सरकार कब विधानसभा बुलाने का फैसला करती है और कब बैठक बुलाई जाएगी, यह दिल्ली सरकार के आला अफसरों को मालूम तक नहीं होता है, जबकि विधानसभा की बैठक बुलाने की पूरी औपचारिकता होती है।
Author नई दिल्ली | July 2, 2017 04:18 am
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल)

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार का वक्त बीते कई महीनों से खराब चल रहा है। लगातार कई चुनावों में मिली हार, पार्टी में मची अंदरूनी कलह और भ्रष्टाचार के संगीन आरोप झेल रही सरकार फिर भी नियमों से परे जाकर मनमानी करने से बाज नहीं आ रही है। इस मनमानी का ही असर है कि सरकार के ज्यादातर अधिकारी उसका आदेश मानने को तैयार नहीं हैं। अपने अधिकार कम करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार से लड़ने वाली अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली सरकार ने खुद अपने ही फैसलों से विधानसभा के अधिकारों को कम किया है। सरकार कब विधानसभा बुलाने का फैसला करती है और कब बैठक बुलाई जाएगी, यह दिल्ली सरकार के आला अफसरों को मालूम तक नहीं होता है, जबकि विधानसभा की बैठक बुलाने की पूरी औपचारिकता होती है। उसके लिए विधान बनाए गए हैं। उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के अनुरोध को स्वीकारते हुए बैठक बुलाने के निर्देश विधानसभा सचिवालय को देते हैं, लेकिन इस सरकार ने तो हद ही कर दी। एक बार तो सरकार ने उपराज्यपाल के खिलाफ ही विशेष बैठक बुला ली थी। 1993 में बनी दिल्ली विधानसभा की 2013 तक केवल तीन विशेष बैठकें हुर्इं वह भी विशेष परिस्थितियों में, जबकि आप सरकार ने सवा दो साल में सात विशेष बैठकें बुलार्इं और एक बार भी उपराज्यपाल से इजाजत नहीं ली। बीते बुधवार को भी नालों की सफाई, दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में आरक्षण और अतिथि शिक्षकों की भर्ती में दिल्लीवालों के लिए 85 फीसद आरक्षण सहित कई मुद्दों पर चर्चा के लिए दो दिन की बैठक बुलाई गई और उसे दो दिन और बढ़ा दिया गया।

विधानसभा की बैठक बुलाने से पहले न तो कार्य मंत्रणा समिति की बैठक हो रही है और न ही विधायकों को पहले से सूचना दी जा रही है। इतना ही नहीं, तय सत्रों में भी कई बार प्रश्नकाल गायब कर दिए जाते हैं। इसके अलावा आप सरकार ने रविवार और सार्वजनिक अवकाश के दिन विधानसभा बुलाकर न केवल नियमों की अनदेखी की, बल्कि परंपराओं को भी तोड़ा। कर्मचारियों व अधिकारियों को छुट्टी के दिन अतिरिक्त पैसे देकर जबरन काम पर बुलाया गया। इससे समय और धन दोनों का नुकसान हुआ। उपराज्यपाल की अनुमति के बिना विधेयक पेश किए गए जो काफी समय से अटके पड़े हैं। संसद राष्ट्रपति और विधानसभाएं राज्यपाल बुलाते हैं और जिस दिन सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाता है उसके दूसरे दिन सत्रावसान के लिए राष्ट्रपति, राज्यपाल या उपराज्यपाल को फाइल भेजी जाती है और फिर नया सत्र उनकी अनुमति से ही बुलाया जाता है। आप सरकार ने दो साल में सत्रावसान करवाया ही नहीं, बल्कि पहले सत्र को ही चलता हुआ मान कर बिना उपराज्यपाल की जानकारी के विधानसभा अध्यक्ष से कह कर बैठक बुला ली जाती है।  इतना ही नहीं मौजूदा सरकार ने कई और नई परंपराएं शुरू की हैं। यह कैसे संभव है कि सरकार निर्देश दे और विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा परिसर में बिना नियम के बनाए गए 21 संसदीय सचिवों के लिए कमरे तैयार करवाएं। लंबे समय तक दिल्ली के विधानसभा सचिव रहे एसके शर्मा कई और उदाहरण बताते हैं जिसमें विधानसभा की स्वायत्तता विधानसभा अध्यक्षों के प्रयास से बचती रही। इसका मतलब यह नहीं कि उन विधानसभा अध्यक्षों ने उपराज्यपाल या दिल्ली सरकार की अवमानना की।

हर सत्र उपराज्यपाल की इजाजत से होता था। इस सरकार में तो सत्रावसान न होने से साल में एक ही सत्र चल रहा है और जब सरकार का मन होता है, तो बिना किसी औपचारिकता के विधानसभा अध्यक्ष से कहकर इसकी विशेष बैठक बुला ली जाती है। इस चक्कर में ज्यादातर बैठकों में प्रश्नकाल जैसे सदन के अनिवार्य कार्य तक नहीं होते हैं। कई चीजें नियमों में न होते हुए भी परंपरा में आ गई हैं। दिल्ली विधानसभा की बैठक दो बजे इसलिए होती है कि सवेरे विधायक अपने इलाके का काम निबटाकर सदन आएं। अब तो बैठक गिनती के दिन होती है तब भी उसी परंपरा को जारी रखा गया है। बैठक का एजंडा भी इस तरह से बनाया जाता रहा है कि ज्यादा जरूरी चीजों पर पहले चर्चा हो। सदन में हर पक्ष को बोलने देने और उनकी बातों को महत्त्व दिलवाने की जवाबदेही विधानसभा अध्यक्ष की होती है। वह भले ही एक पार्टी का होता है, लेकिन उसका आचरण सार्वजनिक रूप से किसी दल के पक्ष में नहीं होता। ऐसी और भी कई परंपराएं हैं जिनका सालों से पालन किया जाता रहा है, लेकिन यह सरकार उस पर पलीता लगाने में जुटी है।

 

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