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जिस वजह से गिरी थी राजीव गांधी की सरकार, अब SC में फिर से हो सकती है उसी केस की सुनवाई

इस सुनवाई का इसलिये महत्व होगा क्योंकि बोफोर्स घोटाले की जांच दोबारा खोलने की सत्तारूढ़ भाजपा सांसदों ने मांग की है।
Author July 30, 2017 21:40 pm
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी। ( Photo Source: Indian Express Archive)

हॉवित्जर तोप सौदे में 1437 करोड़ रुपये के वित्तीय लेन-देन का संकेत देने वाली ताजा मीडिया रिपोर्ट के बीच इस बात की अटकलें हैं कि राजनैतिक रूप से संवेदनशील 64 करोड़ रुपये के बोफोर्स तोप सौदे में भ्रष्टाचार का मामला फिर से उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के लिये आ सकता है। भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अजय कुमार अग्रवाल ने बताया कि यह मामला इस माह की शुरूआत में साप्ताहिक सूची में सूचीबद्ध था लेकिन इस पर सुनवायी नहीं हो सकी। अग्रवाल ने इस मामले में यूरोप के हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ आरोपों को रद्द किए जाने के दिल्ली उच्च न्यायालय के 31 मई 2005 के फैसले को चुनौती दी थी। उन्होंने कहा कि एक बार संविधान पीठ निजता के अधिकार पर सुनवाई पूरी कर ले इसके बाद उच्चतम न्यायालय मामले को सूचीबद्ध कर सकता है। इसके अलावा इस मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए एक आवेदन देने पर भी विचार कर रहे हैं।

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद 90 दिन के भीतर सीबीआई की ओर से याचिका दाखिल नहीं करने के बाद शीर्ष न्यायालय ने 18 अक्तूबर 2005 को उनकी याचिका विचारार्थ स्वीकार कर ली थी। इस सुनवाई का इसलिये महत्व होगा क्योंकि बोफोर्स घोटाले की जांच दोबारा खोलने की सत्तारूढ़ भाजपा सांसदों ने मांग की है। भाजपा सांसदों ने यह मांग तब की थी जब मीडिया में आई खबरों में स्वीडिश मुख्य जांच अधिकारी स्टेन लिड्सट्रॉम ने शीर्ष स्तर पर कथित तौर पर रिश्वत का भुगतान किये जाने का संकेत दिया।

बता दें कि 1987 में बोफोर्स कांड का खुलासा हुआ था। स्वीडन की एक रेडियो सर्विस ने इस बात का खुलासा किया था कि स्वीडन की हथियार कंपनी ने इंडियन आर्मी को बोफोर्स तोप सप्लाई करने का डील फाइनल करने के लिए 80 लाख डॉलर की दलाली चुकायी थी। इस दौरान देश में कांग्रेस की सरकार थी और देष के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। आरोप ये था कि गांधी परिवार के नजदीकी समझे जाने वाले इटली के आर्म्स डीलर ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की। इसके बदले में उसे दलाली का बड़ा हिस्सा मिला। ये घोटाला देश के राजनीतिक रुप से संवेदनशील मामलों में से एक रहा। इस मसले पर 1989 में राजीव गांधी की सरकार गिर गई। काफी दिनों तक राजीव गांधी इस केस के अभियुक्तों की सूची में रहे। लेकिन राजीव गांधी पर आरोप साबित नहीं हो सका। राजीव गांधी की मौत के बाद उनका नाम अभियुक्तों की सूची से बाहर निकाल दिया गया।

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