December 07, 2016

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ATM मशीन क्या जाने पिता के जाने का गम, नोट बंद होने के कारण गहने गिरवी रख किया अंतिम संस्कार

लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के कर्मचारी रमेश के पिता का दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार को देहांत हो गया था।

एटीएम से पैसा निकालने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते लोग। (Source: Reuters)

पुराने नोटों को बंद किए जाने के सरकार के फैसले ने पिता की मौत पर जी भर के रोने भी नहीं दिया। अंत्येष्टि के लिए पैसों के इंतजाम करने के लिए गहने गिरवी रखे और अब अस्थियों का विसर्जन करना है तो एटीएम व बैंकों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। एटीएम मशीन पिता के जाने का दर्द क्या जाने। पड़ोसी भी मदद करना चाहते हैं, लेकिन लाचार हैं। यह दास्तान है लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के कर्मचारी रमेश की। 500 व 1000 रुपए के पुराने नोट बंद होने से मरीजों व अस्पतालों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। दवा विक्रेता व अन्य लोग पुराने नोट लेने में आनाकानी कर रहे हैं। तीमारदारों के सामने सवाल है कि नए नोटों के लिए बैंकों की लाइन में लगें या अपने मरीज की देखभाल करें?

लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल के कर्मचारी रमेश के पिता का दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार को देहांत हो गया था। अचानक आए इस दुख को सहने का हौसला जुटाने और परिवार को ढाढस बंधाने के अहम वक्त में अंत्येष्टि के लिए पैसों के इंतजाम में लगना पड़ा। पिता की लाश घर में छोड़ रमेश पैसों के इंतजाम के लिए निकले। अंबेडकर नगर इलाके के संगम विहार में अंत्येष्टि के लिए भी 500 या हजार के नोेट नहीं लिए जा रहे। पैसों के लिए लाइन में लगे रमेश क ो काफी कोशिशों के बाद भी सफलता नहीं मिली। आखिरकार वह जेवर गिरवी रखने एक परिचित सुनार के पास गए। हालांकि सुनार ने जेवर रखे बिना ही कुछ पैसों का इंतजाम कर दिया। तब जाकर उनके पिता का अंतिम संस्कार हो पाया।

रमेश ने रुंधे गले से कहा कि जो पिता हमेशा के लिए चले गए, उनके साथ थोड़ी देर बैठ भी नहीं पाया। अब उनकी अस्थियां हरिद्वार जाकर गंगा में प्रवाहित करनी हैं, तो सुबह से किराए के लिए भटक रहे हैं। एलएनजेपी अस्पताल में एटीएम मशीन नहीं है तो जीबी पंत अस्पताल की मशीन में पैसा ही नहीं है। गुरु नानक अस्पताल की मशीन पर सात बजे से लाइन में लगे-लगे जब नंबर आया तो कैश ही खत्म हो गया। कई जगह धक्के खाने के बाद सिर्फ चार हजार रुपए मिल पाए। लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के ही मेडिसिन विभाग में पत्नी को भर्ती कराने वाले दीपक ने बताया कि उनको पत्नी के लिए चार यूनिट खून का इंतजाम करना है। जितने खुले पैसे थे, वे अब तक के इलाज में खर्च हो चुके हैं। दवा लानी थी तो दुकानदार ने 500 का नोट नहीं लिया बल्कि आइडी प्रूफ जमा करवा के दवा दी। अब सवाल यह है कि आइडी प्रूफ के बिना नोट कैसे बदलूं?

वहीं लेडी हार्डिंग अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में मां को भर्ती कराने आए रमेश ने बताया कि अभी तो ज्यादा पैसे नहीं लगे, लेकिन मां की स्थिति खराब है आगे जरूरत पड़ सकती है। न तो अस्पताल में फुटकर मिल रहा है न ही आसपास कोई अपना रहता है कि बुला लूं। अगर नोट बदलने जाऊं तो मां के पास कौन रहेगा? बारी आने पर भी जरूरी नहीं कि नए नोट मिल ही जाएं। कलावती सरन बाल चिकित्सालय में अपने बच्चे के इलाज के लिए आए नरेश ने कहा वे अपने पड़ोस में काम करने वाले एक गार्ड से दो हजार रुपए का नया नोट उधार लेकर आए हैं। हालांकि सरकारी अस्पतालों में फिलहाल 500 व 1000 के पुराने नोट लिए जा रहे हैं, लेकिन छुट्टे नहीं होने की बात कह कर बाकी पैसे लौटाए नहीं जा रहे हैं। अस्पतालों के आसपास रहने वाले लोग तो बाकी पैसे लेने के लिए बाद में आ सकते हैं, लेकिन दूर-दराज से आने वाले मरीजों के लिए दोबारा यहां आना काफी मुश्किल है क्योंकि जितने पैसे वापस मिलेंगे उससे ज्यादा तो किराया लग जाएगा। कुल मिलाकर वे दोहरी मार झेल रहे हैंं।

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First Published on November 13, 2016 5:22 am

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