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जेएनयू छात्रसंघ चुनाव: ‘लाल’ को ‘भगवा’ से मिली कड़ी टक्कर

यह पहली बार है जब एबीवीपी के चारों उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे और उन्होंने वाम मोर्चे के प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर दी।
Author नई दिल्ली | September 14, 2017 02:46 am
एबीवीपी के खिलाफ प्रदर्शन करते जेएनयू, डीयू और जामिया के छात्र। (Photo Source: PTI)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्रसंघ की राजनीति पिछले पांच सालों में पूरी तरह से बदल गई है। पहले जहां परिसर में एक वाम संगठन छात्रसंघ में होता तो दूसरा वाम संगठन ही विपक्ष की भूमिका में रहता था। वर्तमान में स्थिति बदल गई है। अब छात्रसंघ कमान तो वाम संगठन के ही पास हैं, चाहे अकेले या गठबंधन में लेकिन मजबूत विपक्ष के तौर एबीवीपी उपस्थित है। इसके अलावा पहले सत्ता और विपक्ष में कुछ मुद्दों को ही लेकर मतभेद होता था लेकिन अब परिसर में वैचारिक प्रतिद्वंद्विता देखने को मिलती है। शून्य से एक मजबूत विपक्ष बनना, परिसर में एबीवीपी के बढ़ने की कहानी बयां करता है।
जेएनयू छात्रसंघ के पदाधिकारियों के लिए इस वर्ष हुआ चुनाव और उसके बाद आए नतीजे कई मायनों में अलग रहे हैं। वाम मोर्चे के उम्मीदवारों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के प्रत्याशियों को हराकर सभी चारों पदों पर जीत दर्ज की। यह पहली बार है जब एबीवीपी के चारों उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे और उन्होंने वाम मोर्चे के प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर दी।

एबीवीपी के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक साकेत बहुगुणा के मुताबिक एबीवीपी को हराने के लिए इस बार तीन वाम संगठनों ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा। उनका कहना है कि यह एबीवीपी की राष्ट्रवादी विचारधारा की जीत है कि कभी आपस में लड़ने वाले संगठनों एक साथ होकर चुनाव लड़ लड़ना पड़ा। इस चुनाव में तीन वाम छात्र संगठन आॅल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), स्टूडेंट्स फेडरेशन आॅफ इंडिया (एसएफआइ) और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ) ने मिलकर चुनाव लड़ा जबकि छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार का संगठन आॅल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआइएसएफ) अकेले चुनाव में मैदान में उतरा।
अध्यक्ष पद पर एबीवीपी का मत फीसद बढ़ा, वाम मोर्चे का घटा
एबीवीपी के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक साकेत बहुगुणा कहते हैं कि हमारे चारों उम्मीदवारों को कुल मिलाकर 3,965 मत मिले हैं और एक संगठन के तौर पर इस वर्ष एबीवीपी सबसे बड़े संगठन के रूप में सामने आया है। इसके अलावा सबसे अधिक 10 काउंसिलर जीतने वाली भी एबीवीपी ही है। हालांकि ये सभी काउंसिलर साइंस स्कूलों से हैं लेकिन वाम छात्र संगठनों का गढ़ माने जाने वाले सामाजिक अध्ययन संस्थान (एसएसएस), अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान (एसआइएस) और भाषा, साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन संस्थान (एसएलएल एंड सीएस) में भी आरएसएस समर्थित छात्र संगठन एबीवीपी ने अच्छी टक्कर दी।

एबीवीपी के अध्यक्ष पद की उम्मीदवार जान्हवी ओझा को पिछले साल 20.90 फीसद मत मिले थे जबकि इस वर्ष अध्यक्ष पद की प्रत्याशी निधि त्रिपाठी को 22.55 फीसद मत मिले। इस हिसाब से एबीवीपी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों को पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष 1.65 फीसद ज्यादा वोट मिले। दूसरी ओर, पिछले साल आइसा और एसएफआइ ने मिलकर चुनाव लड़ा था और अध्यक्ष पद के उम्मीदवार मोहित पांडे को 37.30 फीसद मत मिले थे। इस बार तीन वाम संगठनों ने चुनाव लड़ा और अध्यक्ष पद की उम्मीदवार गीता कुमारी को 32.59 फीसद वोट मिले। इस बार तीन संगठनों के वाम मोर्चे में शामिल होने के बाद भी अध्यक्ष पद की उम्मीदवार को पिछले साल के मुकाबले 4.71 फीसद कम मत मिले।

 

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