May 29, 2017

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आर्थिक सुधारों के अलावा भी कई उपलब्धियां हैं राव की: बारू

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की उपलब्धियों में 1991 के आर्थिक सुधार का सूत्रपात ही नहीं, बल्कि पंजाब में आतंकवाद का सफाया और जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव करवाना भी शामिल है, लेकिन स्वयं उनकी पार्टी ने ही उन्हें नीचा दिखाया।

Author हैदराबाद | October 7, 2016 03:28 am

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की उपलब्धियों में 1991 के आर्थिक सुधार का सूत्रपात ही नहीं, बल्कि पंजाब में आतंकवाद का सफाया और जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव करवाना भी शामिल है, लेकिन स्वयं उनकी पार्टी ने ही उन्हें नीचा दिखाया। यह बात गुरुवार को संजय बारू ने कही। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके बारू ने एक साक्षात्कार में बताया कि कुल मिला कर पार्टी ने उन्हें नीचा दिखाया। उनसे यह पूछा गया था कि क्या वे यह महसूस करते हैं कि राव की उपलब्धियों को समुचित पहचान नहीं मिल पाई। कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने दावा किया कि सोनिया कांगे्रस ने जानबूझ कर राव को बदनाम करने का प्रयास किया, जो 1991-96 तक प्रधानमंत्री थे। बारू ने कहा कि सोनिया कांगे्रस ने जानबूझ कर उन्हें बदनाम किया और उनका नाम इतिहास की पुस्तकों से मिटाने की कोशिश की गई। राव को भारत की आर्थिक व विदेश नीति में व्यापक बदलाव लाने के लिए याद किया जाना चाहिए, विशेषकर भारत के हालिया इतिहास के कठिन क्षणों में। पूर्व वित्त मंत्री मनमोहन सिंह सहित राव और उनकी टीम को 1991 में देश के आर्थिक सुधार कार्यक्रम का श्रेय दिया जाना चाहिए। निस्संदेह, उस समय के प्रधानमंत्री और उनकी टीम, जिसमें तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को श्रेय दिया जाना चाहिए। पीवी ने एक प्रधानमंत्री के रूप में अपना नेतृत्व साबित किया है। यही मेरी पुस्तक में दिखाया गया है।

बारू की नई पुस्तक ‘1991-हाउ पीवी नरसिंह राव ने इतिहास रचा’ हाल में जारी की गई है। उन्होंने कहा कि अपनी उपलब्धियों और सरकार का नेतृत्व करने के मामले में प्रधानमंत्रियों में नरसिंह राव का नाम जवाहरलाल नेहरू के बाद आता है। मेरा मानना है कि राव की उपलब्धियों और उन्होंने जिन आर्थिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में जो काम किया, उसे देखते हुए उन्हें केवल जवाहरलाल नेहरू के बाद ही रखा जा सकता है। राव के पूर्ववर्ती चंद्रशेखर उन चंद नेताओं में शामिल हो सकते थे, जिन्होंने देश के कठिन दौर में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया होता। कुछ अन्य भी कर सकते थे। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी कर सकते थे। पर बहुत अधिक लोग ऐसा नहीं कर सकते थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने एक बार टिप्पणी की थी कि राजीव गांधी यदि 1991 में प्रधानमंत्री बने होते तो उन्होंने भी कमोबेश उसी तरह आर्थिक सुधार शुरू किया होता।

इस टिप्पणी के बारे में पूछने पर बारू ने हैरत जताई कि राजीव गांधी को लोकसभा में व्यापक बहुमत मिलने के बावजूद उन्होंने सुधार कार्यक्रम क्यों नहीं शुरू किए। राजीव गांधी के पास 1984-89 में 400 से अधिक सांसद थे। वे ऐसा करने में असमर्थ क्यों रहे। उनकी राजनीतिक दक्षता सीमित थी। पीवी एक अनुभवी नेता थे, इसीलिए वे पार्टी के भीतर के विरोध को साध लेते थे। बारू ने चिदंबरम की इस टिप्पणी को खारिज कर दिया कि राव ने कांगे्रस कार्य समिति को भंग कर 1992 में कांगे्रस को नीचा दिखाया। इससे पहले राव के कुछ विरोधी निर्वाचित होकर पार्टी के इस शीर्ष निकाय में पहुंच गए थे। उन्होंने कहा कि पीवी ने सफलतापूर्वक संगठनात्मक चुनाव करवाए थे। बहरहाल, उनका मानना था कि उत्तर भारत के कुछ नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया में धांधली की और कोई महिला व दलित नेता नहीं चुना गया। लिहाजा, उन्होंने निर्वाचित सीडब्ल्यूसी भंग कर दी और इसका पुनर्गठन किया। राव ने कांगे्रस को नीचा नहीं दिखाया। कांगे्रस ने अपने स्वयं के कार्यकर्ताओं को नीचा दिखाया।

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First Published on October 7, 2016 3:27 am

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